श्रीरामलीला तिन्दवारी में दशरथ-कैकेयी संवाद और राम वनवास की मार्मिक लीला ने दर्शकों को किया भावविभोर
तिन्दवारी, बांदा : श्रीरामलीला कमेटी तिन्दवारी के तत्वावधान में आयोजित रामलीला महोत्सव में आज मंच पर दशरथ-कैकेयी संवाद, प्रभु श्रीराम के वनवास और तमसा तट पर विश्राम की मार्मिक लीलाओं का भावपूर्ण मंचन किया गया। कलाकारों के सजीव अभिनय ने रामकथा के उन प्रसंगों को जीवंत कर दिया, जिन्होंने भारतीय जनमानस को सदियों से त्याग, कर्तव्य, मर्यादा और पारिवारिक संबंधों की गरिमा का संदेश दिया है।
लीला का वातावरण उस समय भावुक हो उठा, जब दासी मंथरा के बहकावे में आकर महारानी कैकेयी ने राजा दशरथ से अपने दो वरदान मांग लिए। एक ओर राजतिलक की तैयारियों में मग्न अयोध्या थी, तो दूसरी ओर नियति प्रभु श्रीराम के वनगमन की पटकथा लिख रही थी। कैकेयी के कोपभवन, राजा दशरथ की विवशता और प्रभु श्रीराम के सहज भाव से वनवास स्वीकार करने के दृश्यों ने दर्शकों को भावविभोर कर दिया।
वनवास का प्रसंग केवल एक राजकुमार के वन जाने की कथा नहीं, बल्कि वचन की मर्यादा के लिए राजसुख का त्याग करने वाले आदर्श पुत्र की महान गाथा है। प्रभु श्रीराम ने पिता के वचन की रक्षा के लिए बिना किसी प्रतिरोध के चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार कर यह संदेश दिया कि मर्यादा और कर्तव्य मनुष्य के व्यक्तिगत सुख से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं। इसके पश्चात तमसा तट पर विश्राम की लीला ने दर्शकों के सामने अयोध्या से दूर जाते प्रभु श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण के त्यागपूर्ण जीवन का मार्मिक चित्र प्रस्तुत किया। राजमहल के वैभव को छोड़कर वनपथ पर अग्रसर रघुनंदन की यह यात्रा दर्शकों के मन में करुणा, श्रद्धा और भक्ति का संचार करती रही। आज की लीला में कलाकारों ने अपने अभिनय कौशल से विशेष प्रभाव छोड़ा। मंथरा की भूमिका में अलबेला जी, उन्नाव ने अपने सशक्त संवादों, भाव-भंगिमाओं और प्रभावशाली प्रस्तुति से दर्शकों की खूब सराहना प्राप्त की।वहीं राजा दशरथ की भूमिका में प्रसिद्ध कलाकार महेश त्रिपाठी ने पिता के वात्सल्य, वचनबद्धता और पुत्र-वियोग की व्याकुलता को जिस संवेदनशीलता से प्रस्तुत किया, उसने दर्शकों के हृदय को स्पर्श किया। उनके अभिनय में एक असहाय पिता का दर्द और एक वचनबद्ध राजा का धर्म-संकट साकार होता दिखाई दिया।
कार्यक्रम में हास्य कलाकार शिखर अवस्थी ने अपनी विशिष्ट कौमिक शैली से दर्शकों को खूब गुदगुदाया। गंभीर एवं मार्मिक प्रसंगों के बीच उनकी हास्यपूर्ण प्रस्तुति ने वातावरण को हल्का और मनोरंजक बनाए रखा।
श्रीरामलीला कमेटी के प्रबंधक हरवंश श्रीवास्तव ने कहा कि रामलीला केवल धार्मिक आस्था का आयोजन नहीं, बल्कि जीवन को संस्कारित करने वाली हमारी अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर है। राम वनवास का प्रसंग हमें सिखाता है कि परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, मनुष्य को अपने कर्तव्य, वचन और नैतिक मूल्यों से विमुख नहीं होना चाहिए।
उन्होंने कहा, “प्रभु श्रीराम ने पिता के वचन की रक्षा के लिए राजसिंहासन का त्याग कर दिया, माता सीता ने सुख-सुविधाओं से परे अपने जीवनसाथी का साथ चुना और लक्ष्मण ने भ्रातृ-प्रेम एवं सेवा का अनुपम आदर्श प्रस्तुत किया। आज जब परिवारों और सामाजिक संबंधों में संवेदनशीलता तथा विश्वास की आवश्यकता है, तब रामकथा के ये प्रसंग हमें अपने जीवन और व्यवहार का पुनर्मूल्यांकन करने की प्रेरणा देते हैं।” प्रबंधक ने आगे कहा कि रामलीला की सार्थकता तभी है, जब मंच पर प्रस्तुत आदर्श हमारे आचरण में भी दिखाई दें। श्रीरामलीला कमेटी का उद्देश्य मनोरंजन के साथ-साथ नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति, पारिवारिक मूल्यों, त्याग, सेवा और मर्यादा से जोड़ना है।
राम वनवास की लीला रामायण के सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रसंगों में से एक है। यह प्रसंग बताता है कि महानता अधिकार प्राप्त करने में नहीं, बल्कि कर्तव्य निभाने में निहित है। प्रभु श्रीराम चाहते तो अपने पक्ष में परिस्थितियां बदल सकते थे, किंतु उन्होंने पिता के वचन और रघुकुल की मर्यादा को सर्वोपरि रखा।
राजा दशरथ का पुत्र-वियोग, कैकेयी का मोह, मंथरा की कुटिलता और श्रीराम का धैर्य—ये सभी प्रसंग मानव स्वभाव के विविध पक्षों को उजागर करते हैं। कथा यह भी संदेश देती है कि अनुचित परामर्श और क्षणिक मोह कभी-कभी पूरे परिवार तथा समाज के जीवन में गहरा संकट उत्पन्न कर सकते हैं।तमसा तट का विश्राम इस बात का प्रतीक है कि जीवन की कठिन यात्राओं में त्याग और धैर्य ही मनुष्य के सच्चे साथी होते हैं। प्रभु श्रीराम का वनगमन अंततः धर्म की स्थापना और लोककल्याण की दिशा में आगे बढ़ने वाला ऐतिहासिक मोड़ सिद्ध हुआ।
इस अवसर पर श्रीरामकार्यसेवक सुरेश प्रजापति, हुकुमचंद गुप्ता सहित कमेटी के सदस्य, पदाधिकारी एवं अनेक श्रद्धालु उपस्थित रहे। सभी ने श्रद्धापूर्वक लीला का अवलोकन किया और आयोजन की सराहना की।
“राजसिंहासन छूट गया, राजसी वैभव दूर हुआ, लेकिन मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का आदर्श युगों-युगों के लिए अमर हो गया। यही राम वनवास की लीला का शाश्वत संदेश है।”
रिपोर्टर : क़ासिद अली सिद्दीकी

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