बंगाल चुनाव में विपक्ष की हार ने भड़काई देशव्यापी प्रदर्शन की आग ?, रणनीति या इत्तफाक ?, क्या है सच ?
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में विपक्ष को मिली करारी शिकस्त के बाद से देश की राजनीति में भूचाल आ गया है। चुनाव परिणामों के बाद से ही हो रहे देशव्यापी प्रदर्शनों ने राजनीतिक गलियारों में एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या यह जनता का स्वाभाविक आक्रोश है या फिर विपक्ष की सोची-समझी रणनीति ?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह घटनाक्रम दोनों का मिला-जुला रूप है, लेकिन इसी राजनीतिक उठापटक के बीच मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर उपजा विवाद इस आग में घी का काम कर रहा है।
2 अक्टूबर को होने जा रहे "जेल भरो आन्दोलन" की कहानी
बंगाल चुनाव के परिणामों की तपिश ठंडी भी नहीं हुई थी कि मीडिया रिपोर्ट्स में धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की गूँज ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया, CJP के उस एक सफल आन्दोलन ने लोकतंत्र की चरमराती दीवार में मरम्मत का काम किया, इसी सुधार की राह में अब एक बार फिर देशव्यापी प्रदर्शन देखने को मिल सकता है, दरअसल चुनाव आयोग के भीतर गंभीर मतभेदों के खुलासे ने सनसनी फैला दी। रिपोर्ट्स के अनुसार, दो अन्य चुनाव आयुक्तों द्वारा पिछले कुछ महीनों में आयोग के कई फैसलों और विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़ी प्रक्रियाओं पर आपत्तियां दर्ज कराई गई थीं। इन खुलासे के बाद मुख्य विपक्षी दलों और विभिन्न संगठनों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
जिसमे CJP ने मुख्या रूप से 2 अक्टूबर को मुंबई के शिवाजी पार्क में जेल भरो आन्दोलन का ऐलान कर दिया है, कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दल और कई राजनीतिक संगठन, मुख्य चुनाव आयुक्त पर पक्षपात और मतदाता सूचियों से बड़े पैमाने पर नाम हटाने का गंभीर आरोप लगा रहे हैं। विपक्ष ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग तेज कर दी है और संसद के स्तर पर भी महाभियोग लाने की सुगबुगाहट तेज हो गई है।
इस विवाद के तूल पकड़ने के बाद देश के कई हिस्सों में कांग्रेस, RJD,CJP और अन्य संगठनों द्वारा जोरदार प्रदर्शन, पुतले दहन और मार्च निकाले जा चुके हैं। इसी कड़ी में, अब 2 अक्टूबर यानी गांधी जयंती के अवसर पर दिल्ली के जंतर-मंतर सहित देश भर में एक बड़े और निर्णायक देशव्यापी आंदोलन/प्रदर्शन की रूपरेखा तैयार की गई है। आयोजकों और विपक्षी कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह आंदोलन देश की संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता और लोकतांत्रिक अधिकारों को बचाने के लिए है।
फायेदे की रोटी सेक रहा है विपक्ष, क्या है भूमिका ?
लोक सभा सांसद और नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी की भूमिका इस पूरे प्रक्ररण में बिल्कुल अलग रहे है, गौरतलब है की राहुल गाँधी पिछले कई वर्षों से "वोट चोरी" के मुद्दे को उठा रहे थे, लेकिन अब जब पूरा मामला लोगों के सामने आ चुका है, और लोग जब खुल कर इस पर अपना विरोध जाहिर कर रहे है तो ऐसे में राहुल गाँधी शांत नज़र आ रहे है, इस पूरे खुलासे के बाद राहुल गाँधी ने एक प्रेस कांफ्रेंस करते हुए "मैंने तो पहले ही बोला था" का राग अलापते हुए श्रेय लेने मैदान में कूद पड़े है, लेकिन जब विरोध प्रदर्शन और आवाज़ उठाने की बारी आई तो आगे की रणनीति को ज़ाहिर करने में कोई ठोस कदम नहीं उठाये, ऐसे में राजनैतिक गलियारों में सवाल ये उठ रहे है की क्या "CJP" कांग्रेस की B टीम के रूप में राजनीति कर रही है, या "CJP" आन्दोलनकारी राजनीति से अपना राजनैतिक रास्ता साफ़ कर रही है, यह पूरा घटनाक्रम आने वाले दिनों में सत्ता पक्ष और चुनाव आयोग के खिलाफ विपक्ष के तीखे संघर्ष का एक नया केंद्र बनता जा रहा है।

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