प्रशांत किशोर की ऐतिहासिक जीत! BJP-JDU में मचा सियासी भूचाल?
बिहार की राजनीति में एक ऐसा भूचाल आया है, जिसकी धमक पटना से लेकर दिल्ली के संसद भवन तक सुनाई दे रही है! जिस बांकीपुर सीट को भारतीय जनता पार्टी अपना सबसे मजबूत और अजेय किला मानती थी, जहां पिछले तीन दशकों से बीजेपी का परचम लहरा रहा था, उस किले की ईंट से ईंट बजा दी है प्रशांत किशोर और उनकी 'जन सुराज' पार्टी ने! जी हां, 30 साल पुरानी विरासत, नितिन नवीन का अभेद्य गढ़ और बीजेपी का भारी-भरकम आत्मविश्वास....
सब कुछ ताश के पत्तों की तरह ढह गया! और इस महा-हार के ठीक 24 घंटे बाद, दिल्ली के गलियारों में वो हुआ जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी. बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और जदयू के पोस्टर बॉय नीतीश कुमार सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चैंबर में पहुंचे और उनसे मुलाकात की। वहीं अब इस मुलाकात के बाद सवाल उठ रहे हैं कि
आखिर बंद कमरे में क्या पक रहा है? क्या बांकीपुर की हार ने एनडीए के होश उड़ा दिए हैं? क्या बिहार में कोई बड़ा सियासी तख्तापलट होने वाला है या फिर प्रशांत किशोर ने बीजेपी-जदयू का पूरा गणित ही बिगाड़ दिया है? आइए जानते हैं इस रिपोर्ट में!
सबसे पहले बात करते हैं उस चुनावी नतीजे की, जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया है. बांकीपुर विधानसभा सीट पर 30 जुलाई को वोट पड़े थे और 3 अगस्त को जब EVM खुली, तो बीजेपी खेमे में सन्नाटा छा गया. जन सुराज के कप्तान प्रशांत किशोर ने शुरुआत से ही जो बढ़त बनाई, वो आखिरी राउंड तक कायम रही. नतीजों का आंकड़ा देखिए:
जन सुराज के प्रशांत किशोर: 64,151 वोट
बीजेपी के नीरज कुमार सिन्हा: 44,827 वोट
राजद की रेखा गुप्ता: 14,273 वोट
प्रशांत किशोर ने बीजेपी के उम्मीदवार को 19,324 वोटों के भारी-भरकम अंतर से धूल चटा दी. जिस जन सुराज को 2025 के विधानसभा चुनाव में एक भी सीट नसीब नहीं हुई थी, उसने सीधे बीजेपी की सबसे सुरक्षित मानी जाने वाली सीट पर सर्जिकल स्ट्राइक कर दी! आपको बता दें बांकीपुर कोई आम सीट नहीं थी. 1995 से इस सीट पर एक ही परिवार और एक ही पार्टी का कब्जा था. पहले नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा और उसके बाद उनके बेटे नितिन नवीन. नितिन नवीन ने 2010, 2015, 2020 और 2025 के चुनावों में लगातार भारी अंतर से जीत हासिल की थी. हाल ही में जब नितिन नवीन बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने और उन्हें राज्यसभा भेजा गया, तब मार्च 2026 में उन्होंने विधायक पद से इस्तीफा दिया. बीजेपी नेताओं को पूरा भरोसा था कि इस सीट पर तो वे किसी को भी खड़ा कर दें, जीत पक्की है! लेकिन इसी आत्मविश्वास ने बीजेपी की लुटिया डुबो दी. दरअसल, इस उपचुनाव में हाई-वोल्टेज ड्रामे की कोई कमी नहीं थी। भाजपा ने ऐन वक्त पर टिकट बदल दिया।
जी हां बीजेपी ने पहले अभिषेक कुमार को उम्मीदवार घोषित किया था, लेकिन फिर ऐन मौके पर टिकट काटकर नीरज कुमार सिन्हा को दे दिया. आखिरी वक्त में प्रत्याशी बदलने से कार्यकर्ताओं और मतदाताओं में भारी नाराजगी देखने को मिली. वहीं चुनाव प्रचार के दौरान नीतीश कुमार का एक वीडियो सामने आया, जिसमें वे बीजेपी उम्मीदवार के लिए वोट मांग रहे थे. प्रशांत किशोर ने तुरंत दांव खेलते हुए इसे AI से बनाया गया फर्जी वीडियो करार दे दिया! बात इतनी बढ़ी कि जदयू नेताओं ने प्रशांत किशोर के खिलाफ पुलिस में शिकायत तक दर्ज करा दी. वहीं दूसरी तरफ बांकीपुर में महज 34 फीसदी मतदान हुआ. बीजेपी का कैडर वोटर घर से निकला ही नहीं, जबकि युवा और बदलाव चाहने वाला वोटर सीधे प्रशांत किशोर के पक्ष में पोलिंग बूथ तक पहुंचा.
आपको बता दे बांकीपुर में मिली करारी हार का झटका इतना तेज था कि मंगलवार को संसद भवन का माहौल एकदम गरम हो गया. बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, जदयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा और केंद्रीय मंत्री ललन सिंह के साथ सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यालय पहुंचे. हालांकि जदयू ने इसे आधिकारिक तौर पर शिष्टाचार भेंट और पूर्वोत्तर व बिहार के विकास पर चर्चा बताया, लेकिन राजनीतिक गलियारों में खबर पक्की है कि बंद कमरे में बांकीपुर की हार पर ही मंथन हुआ है.
वहीं जदयू के हलकों से अब यह आवाज उठने लगी है कि बीजेपी अपनी मनमानी के कारण हारी है. जदयू के बाहुबली विधायक अनंत कुमार सिंह ने तो खुलकर बम फोड़ दिया! अनंत सिंह ने सीधे-सीधे बयान दिया कि "अगर नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री बने रहते, तो बांकीपुर में बीजेपी की यह दुर्दशा कभी नहीं होती! जनता बीजेपी के तौर-तरीकों से नाराज है. हालांकि जदयू के सूत्र दावा कर रहे हैं कि उपचुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को फ्रंट पर न रखना और बीजेपी का खुद को सर्वेसर्वा समझना ही इस शर्मनाक हार की सबसे बड़ी वजह बनी. वहीं अब सवाल उठता है कि आखिर बांकीपुर जैसी सीट पर भाजपा को झटका क्यों लगा? देखा जाए तो बांकीपुर में हार के 5 बड़े कारण रहे, जिन्होंने बीजेपी का सूपड़ा साफ कर दिया।
तीन दशक से एक ही परिवार और पार्टी का कब्जा रहने से जनता बदलाव चाहती थी.
18 से 30 साल के युवा मतदाता बेरोजगारी, पेपर लीक और प्रतियोगी परीक्षाओं में हो रही धांधली से बेहद गुस्से में थे.
प्रशांत किशोर ने जाति-पात की राजनीति से हटकर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और पलायन जैसे बुनियादी मुद्दों पर चुनाव लड़ा, जिसने पढ़े-लिखे शहरी मतदाताओं को सीधे कनेक्ट किया.
प्रत्याशी बदलने का बीजेपी का फैसला उल्टा पड़ गया.
बीजेपी का अपना कैडर वोटर इस बार सुस्त रहा या फिर उसने प्रशांत किशोर का विकल्प चुन लिया.
कुल मिलाकर देखा जाए तो बांकीपुर का यह उपचुनाव सिर्फ एक सीट का नतीजा नहीं है, यह 2027 के बिहार विधानसभा चुनावों से पहले की वो चिंगारी है, जो पूरे राज्य की राजनीति में आग लगा सकती है! एक तरफ प्रशांत किशोर ने अपनी ताकत दिखाकर यह साबित कर दिया है कि वे बिहार में सिर्फ हवा नहीं बना रहे, बल्कि चुनाव जीतना भी जानते हैं. वहीं दूसरी तरफ, इस हार ने बीजेपी और जदयू के रिश्तों में भी नए सिरे से खींचतान शुरू कर दी है. फिलहाल इतना तो साफ है कि बांकीपुर उपचुनाव ने बिहार की राजनीति में नई बहस जरूर छेड़ दी है। आने वाले दिनों में अगर बिहार की चुनावी रणनीति या गठबंधन की राजनीति में कोई बदलाव दिखाई देता है, तो इस बैठक को उसी संदर्भ में देखा जाएगा।
अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि क्या एनडीए इस हार से सबक लेकर अपनी रणनीति में बदलाव करेगा...क्या जन सुराज पार्टी इस जीत को व्यापक जनसमर्थन में बदल पाएगी...और क्या बिहार की राजनीति में एक नया अध्याय शुरू होने जा रहा है? फिलहाल बांकीपुर का यह उपचुनाव सिर्फ एक सीट का चुनाव नहीं रहा... बल्कि उसने बिहार की राजनीति में कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं। इन सवालों के जवाब आने वाले महीनों में राजनीतिक घटनाक्रम तय करेंगे।
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