21 ट्रकों में 308 मवेशी बरामद, 17 मासूम पशु बच्चों की मौत; कार्रवाई पर उठे गंभीर सवाल

बरही :  बरही थाना क्षेत्र में 21 ट्रकों से 308 मवेशियों की बरामदगी के बाद मामला अब केवल पशु परिवहन पर कार्रवाई तक सीमित नहीं रह गया है। अव्यवस्थित तरीके से पशुओं को कई खटालों में रखे जाने के दौरान 17 पशु बच्चों की मौत की बात सामने आने से प्रशासनिक व्यवस्था और पशुओं की देखरेख पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जानकारी के अनुसार, बरही थाना क्षेत्र में कार्रवाई के बाद बरामद पशुओं को तीन अलग-अलग स्थानों पर रखा गया है। पशुओं के रखरखाव के लिए पर्याप्त चारा, पानी और शेड की व्यवस्था नहीं होने का आरोप लगाया जा रहा है। बारिश के बीच कई पशुओं के खुले में खड़े रहने से उनके बीमार पड़ने की बात भी सामने आई है।

तीन खटालों में रखे गए पशु, 17 बच्चों की मौत का दावा

बताया गया कि एक खटाल में करीब 40 भैंसों के बीच कई बच्चे रखे गए थे, जबकि दूसरे स्थान पर भी बड़ी संख्या में पशुओं को रखा गया। तीसरे स्थान पर भी पशुओं को रखने की बात सामने आई है। पशुओं की देखरेख कर रहे मजदूरों का दावा है कि पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने के कारण अब तक 17 पशु बच्चों की मौत हो चुकी है।

मजदूरों ने बताया कि इतने बड़े पैमाने पर पशुओं के लिए भोजन और पानी की व्यवस्था करना मुश्किल हो रहा है। बारिश में खुले में खड़े रहने के कारण कई पशु बीमार पड़ रहे हैं और छोटे पशु बच्चों की हालत लगातार बिगड़ती जा रही है।

“एक जगह छोड़ती है, दूसरी जगह पकड़ती है”

पशुओं की देखरेख में लगे मजदूरों ने प्रशासन की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि बिहार-झारखंड सीमा के चोरदाहा पुलिस पिकेट से वाहनों को आगे जाने की अनुमति मिल जाती है, जिसके बाद चौपारण थाना क्षेत्र से भी वाहन बेरोकटोक आगे बढ़ते हैं, लेकिन बरही थाना क्षेत्र में उन्हें पकड़ लिया जाता है।

मजदूरों का कहना है कि यह प्रशासन की “दोहरी नीति” जैसी स्थिति है—एक जगह से वाहन पास होते हैं और दूसरी जगह कार्रवाई की जाती है।

हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। मजदूरों ने इस पूरे मामले में कथित राजनीतिक संरक्षण की भी बात कही है, लेकिन किसी व्यक्ति का नाम बताने से इनकार किया।

दुधारू पशुओं को रोकने और अन्य पशुओं को छोड़ने का आरोप

पशु व्यापारियों ने आरोप लगाया कि दुधारू पशुओं के परिवहन से संबंधित कागजात होने के बावजूद उनके वाहनों को रोका गया। उनका यह भी दावा है कि कुछ पशुओं को छोड़ दिया जाता है, जबकि दुधारू पशुओं को कार्रवाई के नाम पर रोक लिया जाता है।

व्यापारियों ने यह भी आरोप लगाया कि प्रति वाहन ₹10 हजार की मांग की गई थी। हालांकि इस आरोप की भी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों का पक्ष सामने आना बाकी है।

“जब वाहन जब्त हैं तो पशुओं को ले जाने की अनुमति क्यों नहीं?”

व्यापारियों का कहना है कि यदि वाहनों को कानून के तहत जब्त किया गया है तो पशुओं को सुरक्षित स्थान पर ले जाने की अनुमति क्यों नहीं दी जा रही है। उनके अनुसार, एक वाहन में नियमानुसार सीमित संख्या में पशु ले जाए जा रहे थे और कई पशुओं के कागजात उनके पास उपलब्ध हैं।

व्यापारियों ने बताया कि एक भैंस की कीमत करीब 80 हजार से एक लाख रुपये तक है। ऐसे में कई दिनों तक पशुओं को रोककर रखने से उन्हें आर्थिक नुकसान के साथ पशुओं के स्वास्थ्य को भी गंभीर खतरा पैदा हो रहा है।

कानून की कार्रवाई के बीच मासूम पशुओं की जान का जिम्मेदार कौन?

पशु क्रूरता के खिलाफ कानून के तहत कार्रवाई करना प्रशासन की जिम्मेदारी है, लेकिन कार्रवाई के बाद जब्त पशुओं की सुरक्षित देखभाल, भोजन, पानी और उपचार की व्यवस्था करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि वास्तव में पर्याप्त व्यवस्था के अभाव में 17 पशु बच्चों की मौत हुई है तो इसकी जिम्मेदारी तय होना आवश्यक है।

अब बड़ा सवाल यह है कि 21 ट्रकों में बरामद 308 पशुओं में 17 मासूम पशु बच्चों की मौत कैसे हुई?
क्या जब्त पशुओं के लिए पर्याप्त चारा, पानी, आश्रय और चिकित्सा व्यवस्था उपलब्ध कराई गई थी?
और यदि पशु परिवहन से जुड़े दस्तावेज वैध थे, तो व्यापारियों के दावों की जांच क्यों नहीं की जा रही? कानून अपना काम करे, लेकिन कानून की कार्रवाई के बीच बेजुबान पशुओं की जान न जाए—यही इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल बनकर सामने आया है।

रिपोर्टर : राहुल राणा

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