बृज भूमि में बसंत पंचमी: जहाँ होली एक दिन नहीं, एक 40 दिवसीय उत्सव है

जब भी बसंत पंचमी आती है, हमारे मन में सबसे पहले माँ सरस्वती, पीले वस्त्र, विद्या और ज्ञान का विचार आता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि बृज भूमि में बसंत पंचमी का अर्थ इससे कहीं अधिक गहरा और रंगीन है?

 बृज में बसंत पंचमी के साथ ही 40 दिनों तक चलने वाले भव्य होली महोत्सव की शुरुआत हो जाती है।

यह सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि कृष्ण-भक्ति, प्रेम, परंपरा और रंगों की जीवंत यात्रा है।

 

 बसंत पंचमी: वसंत ऋतु और सरस्वती वंदना का पर्व

हिंदू पंचांग के अनुसार बसंत पंचमी से वसंत ऋतु का आगमन होता है। खेतों में सरसों पीली हो जाती है, प्रकृति मुस्कुराने लगती है और हर ओर उल्लास का वातावरण बन जाता है।

इस दिन:

  • माँ सरस्वती की पूजा की जाती है
  • विद्यार्थी और कलाकार विद्या-बुद्धि का आशीर्वाद लेते हैं
  • पीले वस्त्र, पीले पुष्प और पीले व्यंजन विशेष महत्व रखते हैं

लेकिन बृज में यहीं से कहानी एक नया मोड़ लेती है…

 क्या होता है इस दिन?

  • मंदिरों में अबीर-गुलाल उड़ाया जाता है
  • ठाकुरजी को पीले वस्त्रों में सजाया जाता है
  • होली के पद और भजन गूंजने लगते हैं
  • श्रद्धालुओं पर रंग डालकर होली खेलने का निमंत्रण दिया जाता है

यहीं से बृज की गलियों में रंग बरसने लगते हैं।

 

40 दिन तक क्यों चलती है बृज की होली?

बृज की होली सामान्य होली से अलग है। यह सिर्फ एक दिन नहीं, बल्कि लगभग 40 दिनों तक चलने वाला उत्सव है, जो बसंत पंचमी से रंग पंचमी तक चलता है।

हर दिन, हर गांव, हर मंदिर की होली का अंदाज़ अलग होता है।

 

बृज होली के प्रमुख रंग-रूप

बृज की होली इसलिए विश्व-प्रसिद्ध है क्योंकि यहाँ हर जगह एक नई परंपरा देखने को मिलती है:

  • लट्ठमार होली (बरसाना-नंदगांव)

राधा रानी की नगरी बरसाना में महिलाएं प्रतीकात्मक रूप से पुरुषों पर लाठियाँ बरसाती हैं — यह कृष्ण-राधा की लीलाओं से जुड़ी अनोखी परंपरा है।

  • फूलों की होली (वृंदावन)

वृंदावन के मंदिरों में गुलाल की जगह फूलों की वर्षा होती है। रंग, खुशबू और भक्ति — सब एक साथ।

  • लड्डूमार होली

भक्तों पर रंगों के साथ-साथ लड्डू भी बरसते हैं — उत्सव और आनंद का अनोखा मेल।

  • हुड़ंगा होली

ग्रामीण इलाकों में खेली जाने वाली यह होली लोकसंस्कृति की जीवंत झलक दिखाती है।


सिर्फ रंग नहीं, भक्ति का उत्सव

बृज की होली सिर्फ मस्ती नहीं, बल्कि श्रीकृष्ण और राधा की लीलाओं की स्मृति है।
यहाँ रंग खेलना एक आध्यात्मिक अनुभव बन जाता है — जहाँ हर गुलाल में भक्ति और हर गीत में रस होता है।

देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु और पर्यटक इस दौरान बृज पहुँचते हैं।

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