भारत करेगा ईरान से तेल आयात, क्या रूस और सऊदी की तुलना में सस्ता पड़ेगा?
BY UJJWAL SINGH
भारत को ईरान से तेल खरीदने में बड़ी राहत मिली है. रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिका ने ईरानी तेल पर अस्थायी छूट दी है, जिससे भारतीय रिफाइनरों के लिए आयात फिर से शुरू करने का मार्ग खुल गया है. वैश्विक ऊर्जा संकट के इस दौर में, जब सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ा हुआ है, यह कदम भारत की तेल खरीद रणनीति पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है. अब सवाल यह है कि क्या ईरानी तेल रूस और सऊदी अरब से सस्ता पड़ेगा या नहीं.
ईरान की रणनीति और कीमत का फायदा
ईरान अपने खोए हुए बाजार हिस्से को वापस पाने की पूरी कोशिश कर रहा है. इस मामले में कीमत उसकी सबसे बड़ी ताकत है. रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान भारत जैसे खरीदारों को आकर्षित करने के लिए भारी छूट दे रहा है. तैरते हुए भंडारों में लगभग 170 मिलियन बैरल कच्चा तेल जमा होने की वजह से ईरान पर इसे जल्द बेचने का दबाव है.इस कारण ईरानी तेल की कीमत काफी कॉम्पिटेटिव रहने की संभावना है. विशेषज्ञों के अनुसार यह कीमत रूस के कच्चे तेल जितनी सस्ती या उससे भी सस्ती हो सकती है.
रूस और सऊदी अरब से तुलना
पिछले दो सालों में रूस भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता रहा. इसकी वजह भारी छूट और निरंतर आपूर्ति रही. लेकिन अब रूस से मिलने वाला लाभ कम होता जा रहा है. 2026 की शुरुआत में रूसी कच्चे तेल पर मिलने वाली छूट $10 से $13 प्रति बैरल थी, जो घटकर अब $4 से $5 प्रति बैरल रह गई है. इसके अलावा, बैन, बीमा संबंधी बाधाएं और लंबी समुद्री दूरी जैसी लॉजिस्टिक चुनौतियां कुल लागत को बढ़ा रही हैं.
सऊदी अरब भारत के लिए स्थिर और भरोसेमंद आपूर्तिकर्ता है. लेकिन इसकी कीमत रूस और ईरान के मुकाबले 7% से 12% ज्यादा होती है. हालांकि भू-राजनीतिक रूप से सुरक्षित और लगातार आपूर्ति की वजह से यह विकल्प भरोसेमंद माना जाता है.
ईरानी तेल का आर्थिक और रणनीतिक फायदा
भूगोल भी कीमत तय करने में अहम भूमिका निभाता है. ईरान भारत के ज्यादा करीब है, जिससे माल ढुलाई का समय और लागत कम होती है. इससे भारत के लिए ईरानी तेल और भी फायदेमंद बन जाता है. इसके अलावा, ईरान से लेन-देन के लिए रुपया-रियाल सिस्टम जैसे विकल्प उपलब्ध हैं, जिससे भारत अपनी डॉलर पर निर्भरता कम कर सकता है.
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