महिला आरक्षण बिल लोकसभा में गिरा: मोदी सरकार को बड़ा राजनीतिक झटका या रणनीतिक दांव?


लोकसभा में महिला आरक्षण से जुड़ा संविधान संशोधन बिल पास नहीं हो सका, और इसी के साथ संसद में एक बड़ा सियासी ड्रामा देखने को मिला। इस फैसले को मोदी सरकार के लिए अहम झटका माना जा रहा है, क्योंकि पिछले 12 वर्षों में यह पहली बार है जब कोई संवैधानिक संशोधन विधेयक लोकसभा से पारित नहीं हो पाया।

मतदान के दौरान 298 सांसदों ने बिल के समर्थन में वोट किया, जबकि 230 सांसद इसके विरोध में खड़े नजर आए। लेकिन दो-तिहाई बहुमत का जादुई आंकड़ा हासिल न होने के कारण यह बिल गिर गया। नतीजतन, लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को 33% आरक्षण देने का सपना फिलहाल अधर में लटक गया है।

संसद में हंगामा और सियासी आरोप-प्रत्यारोप
बिल के गिरते ही सियासी तापमान तेजी से बढ़ गया। बीजेपी की महिला सांसदों ने सदन के भीतर विरोध दर्ज कराया, वहीं पार्टी ने देशभर में आंदोलन का ऐलान कर दिया है। गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष पर तीखा हमला बोलते हुए इसे महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ कदम बताया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस मुद्दे पर विपक्ष से सहयोग की अपील की थी और इसे “नारी शक्ति को उसका हक देने का ऐतिहासिक अवसर” बताया था।विपक्ष का पलटवार: “चुनावी नक्शा बदलने की कोशिश”दूसरी ओर विपक्ष ने सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। राहुल गांधी ने कहा कि सरकार महिला आरक्षण के नाम पर देश के चुनावी ढांचे और प्रतिनिधित्व को बदलने की कोशिश कर रही है। विपक्ष का तर्क है कि जब तक जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तब तक इस तरह का बदलाव असंतुलन पैदा कर सकता है।

बिल क्यों बना विवाद का केंद्र?
यह विधेयक 2023 में पारित महिला आरक्षण कानून को संशोधित कर उसे जल्दी लागू करने की कोशिश था। इसमें लोकसभा और विधानसभाओं में सीटों की संख्या बढ़ाकर महिलाओं के लिए 33% आरक्षण सुनिश्चित करने का प्रस्ताव था, ताकि मौजूदा सीटों में कटौती किए बिना प्रतिनिधित्व दिया जा सके।सरकार का कहना था कि लंबे समय से लंबित इस मांग को अब तुरंत लागू किया जाना चाहिए, जबकि विपक्ष इसे प्रक्रियात्मक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर विवादित बता रहा था।

सरकार ने संकेत दिए हैं कि वह इस मुद्दे को जनता के बीच लेकर जाएगी और विपक्ष को जवाबदेह ठहराने की कोशिश करेगी। वहीं राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा आने वाले समय में एक बड़ा चुनावी और वैचारिक बहस का केंद्र बन सकता है।महिला आरक्षण का सवाल नया नहीं है—लेकिन इस बार संसद के भीतर जो नतीजा आया है, उसने इसे फिर से राष्ट्रीय राजनीति के सबसे गर्म मुद्दों में ला खड़ा किया है।

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