हिमंत बिस्व सरमा फिर बने असम के मुख्यमंत्री: कांग्रेस से BJP तक का दमदार सियासी सफर
Himanta Biswa Sarma आज भारतीय राजनीति के सबसे चर्चित और प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते हैं, असम में भाजपा को लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी दिलाने में उनकी बड़ी भूमिका रही है.हालांकि, भाजपा के लिए उनकी राजनीतिक यात्रा 2021 में मुख्यमंत्री बनने से काफी पहले शुरू हो चुकी थी. वर्ष 2016 से ही वे असम में भाजपा के सबसे बड़े रणनीतिकार और संगठनकर्ता के रूप में उभरे। कांग्रेस से राजनीति शुरू करने वाले हिमंत आज भाजपा और पूर्वोत्तर राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा बन चुके हैं.
शुरुआती जीवन और शिक्षा
हिमंत बिस्व सरमा का जन्म 1 फरवरी 1969 को असम के जोरहाट में हुआ था। बाद में उनका परिवार गुवाहाटी के उलुबारी और गांधीबस्ती इलाके में बस गया। उनका पैतृक घर नलबाड़ी जिले के लतीमा गांव में है.उन्होंने 1985 में कामरूप अकादमी स्कूल से अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की. इसके बाद प्रतिष्ठित कॉटन कॉलेज में दाखिला लिया और 1990 में राजनीति विज्ञान में स्नातक तथा 1992 में परास्नातक की डिग्री हासिल की। आगे चलकर उन्होंने बीआरएम गवर्नमेंट लॉ कॉलेज, गुवाहाटी से एलएलबी किया. वर्ष 2006 में उन्होंने गुवाहाटी विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में पीएचडी भी पूरी की.
वकालत से छात्र राजनीति तक का सफर
राजनीति में सक्रिय होने से पहले हिमंत ने कानून के क्षेत्र में भी काम किया। वे 1995 में सॉलिसिटर बने और 1996 से 2001 तक गुवाहाटी हाईकोर्ट में वकालत करते रहे।उनकी राजनीतिक पहचान छात्र राजनीति से बनी. वे ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) से जुड़े और अपनी प्रभावशाली भाषण शैली तथा संगठन क्षमता के कारण तेजी से लोकप्रिय हुए। 1987 में वे कॉटन College छात्र संघ के सहायक महासचिव चुने गए. इसके बाद लगातार तीन बार छात्र संघ के महासचिव बने.
कांग्रेस में एंट्री और तेजी से बढ़ता कद
1991 के आसपास आसू से मतभेद होने के बाद हिमंत ने कांग्रेस का दामन थाम लिया. तत्कालीन मुख्यमंत्री Hiteswar Saikia ने युवाओं के बीच कांग्रेस को मजबूत करने के लिए उन्हें आगे बढ़ाया.1996 में उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर पहला विधानसभा चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए. इसके बाद 2001 में जालुकबारी सीट से जीत दर्ज कर पहली बार विधायक बने. 2006 और 2011 में भी उन्होंने भारी मतों से जीत हासिल की.मुख्यमंत्री Tarun Gogoi के कार्यकाल में हिमंत सरकार के सबसे शक्तिशाली नेताओं में शामिल हो गए. उन्हें स्वास्थ्य, शिक्षा, वित्त और लोक निर्माण जैसे महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी मिली. स्वास्थ्य मंत्री रहते हुए उन्होंने कई मेडिकल कॉलेजों की स्थापना में अहम भूमिका निभाई.
राहुल गांधी से नाराजगी और भाजपा में शामिल होने की कहानी
2011 के बाद कांग्रेस में हिमंत और तरुण गोगोई के बीच मतभेद बढ़ने लगे। हिमंत खुद को मुख्यमंत्री पद का दावेदार मानते थे, जबकि गोगोई अपने बेटे गौरव गोगोई को आगे बढ़ा रहे थे.2015 में राहुल गांधी से हुई एक बैठक के बाद उनका कांग्रेस से मोहभंग हो गया. हिमंत का आरोप था कि राहुल गांधी ने उनकी बातों को गंभीरता से नहीं सुना. इसके बाद उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी और 23 अगस्त 2015 को Amit Shah की मौजूदगी में भाजपा में शामिल हो गए.
भाजपा में बने सबसे बड़े रणनीतिकार
भाजपा में शामिल होने के बाद हिमंत ने अपनी रणनीतिक क्षमता का परिचय दिया. 2016 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने पहली बार असम में सरकार बनाई. इसके बाद उन्हें नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस (नेडा) का संयोजक बनाया गया.
उनकी रणनीति के दम पर भाजपा ने अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और मेघालय जैसे राज्यों में भी अपनी पकड़ मजबूत की। 2021 में भाजपा की दोबारा जीत के बाद हिमंत बिस्व सरमा को असम का मुख्यमंत्री बनाया गया.
कट्टर हिंदुत्व और जननेता की छवि
मुख्यमंत्री बनने के बाद हिमंत ने गोहत्या विरोधी कानून लागू किया, मदरसों को सामान्य स्कूलों में बदला और अवैध कब्जों के खिलाफ अभियान चलाया.कांग्रेस पृष्ठभूमि से आने के बावजूद उन्होंने भाजपा की हिंदुत्व राजनीति को पूरी तरह अपनाया.
इसके साथ ही उन्होंने जनता के बीच अपनी अलग पहचान बनाई। असम के लोग उन्हें प्यार से “मामा” और “दादा” कहकर बुलाते हैं। जनता से सीधा संवाद और जमीनी राजनीति ने उन्हें भाजपा का सबसे भरोसेमंद नेता बना दिया है.

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