पेपर लीक विवाद के बीच चर्चा में आए मौलाना अबुल कलाम आजाद, जिन्हें माना जाता है भारत का सबसे सफल शिक्षा मंत्री

देश में एक बार फिर परीक्षा पेपर लीक का मुद्दा सुर्खियों में है। कॉकरोच जनता पार्टी ने आज दिल्ली के जंतर-मंतर पर अपना पहला आंदोलन आयोजित किया, जिसमें NEET-UG पेपर लीक विवाद तथा CBSE, CUET और SSC-GD जैसी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर जवाबदेही की मांग की गई। इसी बीच भारत के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद का नाम चर्चा में है, जिनके कार्यकाल को शिक्षा व्यवस्था में अनुशासन और पारदर्शिता के लिए याद किया जाता है।

शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने में अहम भूमिका

मौलाना अबुल कलाम आजाद ने 1947 से 1958 तक स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षा मंत्री के रूप में कार्य किया। उन्हें देश के सबसे प्रभावशाली और सफल शिक्षा मंत्रियों में गिना जाता है। उनके कार्यकाल के दौरान परीक्षाएं सख्त प्रशासनिक व्यवस्था के तहत आयोजित की गईं और संगठित पेपर लीक से जुड़ा कोई बड़ा विवाद सामने नहीं आया। उनका मुख्य फोकस शिक्षा के विस्तार, संस्थानों को मजबूत बनाने और देश के लिए दीर्घकालिक शैक्षणिक ढांचा तैयार करने पर था।

प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों की नींव

आजाद का सबसे बड़ा योगदान भारतीय उच्च शिक्षा को मजबूत आधार प्रदान करना रहा। उनके कार्यकाल में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IITs) की नींव रखी गई, जिसने देश को मजबूत तकनीकी कार्यबल विकसित करने में मदद की। इसके अलावा उन्होंने भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) को सशक्त बनाने तथा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का समर्थन

मौलाना आजाद का मानना था कि शिक्षा हर नागरिक का मौलिक अधिकार है। उन्होंने 14 वर्ष तक के सभी बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा की जोरदार वकालत की। उनकी सोच और नीतियों ने आगे चलकर शिक्षा के अधिकार (RTE) अधिनियम की वैचारिक नींव तैयार करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

महिला शिक्षा और ग्रामीण साक्षरता पर जोर

महिला साक्षरता दर कम होने के बावजूद आजाद ने महिलाओं की शिक्षा को राष्ट्रीय विकास की कुंजी माना। साथ ही उन्होंने ग्रामीण भारत में शिक्षा के अवसर बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया। वर्ष 1956 में उन्होंने राष्ट्रीय ग्रामीण उच्च शिक्षा परिषद के गठन का समर्थन किया, जिसका उद्देश्य गांवों और छोटे शहरों में साक्षरता, वयस्क शिक्षा और उच्च शिक्षा के अवसरों को बढ़ावा देना था।

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