Ghaziabad Illegal Gender Test: चलती कार में अवैध लिंग जांच का भंडाफोड़, जानिए जेंडर टेस्ट कराने और करने पर क्या है सजा
उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में चलती कार के अंदर अवैध तरीके से गर्भस्थ शिशु का लिंग परीक्षण (जेंडर टेस्ट) करने वाले एक शातिर गिरोह का पुलिस और स्वास्थ्य विभाग ने संयुक्त कार्रवाई में पर्दाफाश किया है. इस मामले में चार आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है. घटना ने एक बार फिर भ्रूण लिंग जांच के अवैध कारोबार और उससे जुड़े गंभीर अपराधों को सामने ला दिया है. भारत में गर्भ में पल रहे शिशु का लिंग बताना, उसकी जांच करना या करवाना कानूनन प्रतिबंधित है. इतना ही नहीं, इस अपराध में केवल डॉक्टर या लैब संचालक ही नहीं बल्कि जांच कराने की मांग करने वाले पति और परिजन भी समान रूप से दोषी माने जाते हैं.
PC-PNDT कानून क्या है?
देश में बेटियों की सुरक्षा और घटते लिंगानुपात को सुधारने के उद्देश्य से वर्ष 1994 में पीसीपीएनडीटी (Pre-Conception and Pre-Natal Diagnostic Techniques) अधिनियम लागू किया गया था. इस कानून के तहत गर्भ में पल रहे शिशु का लिंग पता करना, बताना या किसी भी माध्यम से उजागर करना पूरी तरह प्रतिबंधित है. कानून की नजर में इस अवैध कारोबार में शामिल डॉक्टर, लैब संचालक, बिचौलिए और सहयोगी सभी गंभीर अपराधी माने जाते हैं.
डॉक्टर और लैब संचालकों के लिए क्या है सजा?
यदि कोई डॉक्टर, टेक्नीशियन या लैब संचालक पहली बार भ्रूण लिंग जांच करते हुए पकड़ा जाता है तो उसे तीन साल तक की जेल और 50 हजार रुपये तक के जुर्माने की सजा हो सकती है. इसके अलावा संबंधित डॉक्टर का मेडिकल लाइसेंस तत्काल निलंबित कर दिया जाता है. दोष सिद्ध होने पर उसका नाम मेडिकल काउंसिल के रजिस्टर से पांच वर्ष के लिए हटा दिया जाता है.
यदि वही व्यक्ति दोबारा इस अपराध में शामिल पाया जाता है तो सजा और अधिक कठोर हो जाती है. ऐसी स्थिति में पांच साल तक की जेल, एक लाख रुपये तक का जुर्माना और डॉक्टर या संचालक का मेडिकल रजिस्ट्रेशन हमेशा के लिए रद्द किया जा सकता है, जिसके बाद वह दोबारा चिकित्सा अभ्यास नहीं कर सकता.
जेंडर टेस्ट कराने वाले परिजनों पर क्या होती है कार्रवाई?
कानून केवल जांच करने वालों पर ही नहीं, बल्कि जांच कराने की मांग करने वाले पति, परिवार के सदस्य या अन्य रिश्तेदारों पर भी समान रूप से लागू होता है. यदि कोई व्यक्ति गर्भवती महिला पर भ्रूण का लिंग जानने का दबाव बनाता है या जांच कराने की कोशिश करता है तो पहली बार में ही उसे तीन साल तक की कैद और 50 हजार रुपये तक के जुर्माने का सामना करना पड़ सकता है.
अगर चेतावनी के बाद भी परिवार के लोग दोबारा महिला पर जेंडर टेस्ट कराने का दबाव डालते हैं या चोरी-छिपे जांच करवाते हैं तो उनके खिलाफ पांच साल तक की जेल और एक लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है. इसलिए यह धारणा पूरी तरह गलत है कि ऐसे मामलों में केवल डॉक्टर ही दोषी होता है. भारतीय कानून के अनुसार इस अपराध में शामिल प्रत्येक व्यक्ति के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाती है.
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