Organ Donation: 7 साल के बच्चे के अंग कितनी उम्र के मरीजों में लगाए जा सकते हैं? जानिए पूरी प्रक्रिया
तमिलनाडु के सात वर्षीय बच्चे लोकिनेनी यशवान की कहानी ने पूरे देश को भावुक कर दिया। इस बच्चे के अंगदान से छह लोगों को नई जिंदगी मिली। इस घटना के बाद लोगों के मन में यह सवाल उठने लगा है कि क्या किसी बच्चे के दान किए गए अंग सिर्फ बच्चों में ही लगाए जा सकते हैं या फिर इन्हें बड़े मरीजों में भी ट्रांसप्लांट किया जा सकता है। आइए जानते हैं अंगदान से जुड़ी पूरी प्रक्रिया और नियम।
7 साल के बच्चे के अंग किस उम्र के मरीजों में लगाए जा सकते हैं?
विशेषज्ञों के अनुसार, 7 साल के बच्चे के दान किए गए अंग किसी भी उम्र के मरीजों में ट्रांसप्लांट किए जा सकते हैं। इसके लिए मरीज की उम्र से ज्यादा जरूरी होता है कि डोनर और रिसीवर का ब्लड ग्रुप, टिश्यू टाइप और शरीर का आकार एक-दूसरे से मेल खाए।
नेशनल ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गेनाइजेशन (NOTTO) की गाइडलाइंस के अनुसार, अंगदान करने वालों के लिए पहले लागू 65 साल की अधिकतम उम्र सीमा को हटा दिया गया है। अब अंगों की गुणवत्ता और मरीज की जरूरत के आधार पर फैसला लिया जाता है।
कौन-कौन से मरीज बच्चों के अंग प्राप्त कर सकते हैं?
अंग का प्रकार यह तय करता है कि उसे किस मरीज में ट्रांसप्लांट किया जा सकता है। छोटे बच्चों के दिल, फेफड़े और लीवर जैसे अंग आमतौर पर समान उम्र या शरीर के आकार वाले बच्चों में लगाए जाते हैं, क्योंकि उनका आकार और जरूरतें एक जैसी होती हैं।
हालांकि, कुछ परिस्थितियों में बच्चों के अंग बड़े मरीजों में भी लगाए जा सकते हैं। उदाहरण के लिए, छोटे बच्चे की दोनों किडनी को एक साथ किसी वयस्क मरीज में ट्रांसप्लांट किया जा सकता है। समय के साथ ये किडनी शरीर में विकसित होकर सामान्य तरीके से काम कर सकती हैं।
कुछ विशेष मेडिकल तकनीकों की मदद से बच्चे का लीवर या लीवर का कुछ हिस्सा छोटे आकार वाले वयस्क मरीज में भी लगाया जा सकता है।
कॉर्निया, त्वचा और हार्ट वॉल्व के लिए अलग नियम
कॉर्निया, त्वचा और दिल के वॉल्व जैसे अंगों के ट्रांसप्लांट में उम्र और शरीर के आकार की सीमा ज्यादा सख्त नहीं होती। इन्हें अलग-अलग उम्र के मरीजों में सफलतापूर्वक लगाया जा सकता है।
ब्रेन डेथ के बाद ही शुरू होती है अंगदान की प्रक्रिया
अंगदान की प्रक्रिया तभी शुरू हो सकती है जब मरीज को ब्रेन डेड घोषित किया जाए। सरकारी नियमों के अनुसार, डॉक्टरों की एक विशेष टीम ब्रेन फंक्शन की दो अलग-अलग जांच करती है। इन दोनों जांचों के बीच छह घंटे का अंतर रखा जाता है।
ब्रेन डेथ की पुष्टि होने के बाद ही डेथ सर्टिफिकेट जारी किया जाता है और अंगदान की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाती है।
नाबालिग डोनर के लिए माता-पिता की सहमति जरूरी
अगर अंगदान करने वाला व्यक्ति नाबालिग है, तो उसके माता-पिता या कानूनी अभिभावक की लिखित सहमति अनिवार्य होती है। अस्पताल परिवार की अनुमति के बिना अंगदान की प्रक्रिया शुरू नहीं कर सकता।
सहमति मिलने के बाद अस्पताल इसकी जानकारी नेशनल ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गेनाइजेशन (NOTTO) को देता है। इसके बाद राष्ट्रीय वेटिंग लिस्ट के आधार पर सबसे उपयुक्त मरीज का चयन किया जाता है।
सही मरीज का चयन कैसे होता है?
ट्रांसप्लांट की सफलता के लिए मरीज का चयन कई मानकों पर किया जाता है। इसमें ब्लड ग्रुप, टिश्यू मैचिंग, शरीर का आकार और मरीज की मेडिकल स्थिति को ध्यान में रखा जाता है। इस पूरी प्रक्रिया का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि दान किया गया अंग जरूरतमंद मरीज को मिलकर उसे बेहतर जीवन दे सके।
लोकिनेनी यशवान जैसे बच्चों का अंगदान यह दिखाता है कि एक छोटे से फैसले से कई लोगों को नई उम्मीद और जीवन मिल सकता है।
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