Chandipura Virus: गुजरात में फिर लौटा जानलेवा चांदीपुरा वायरस, जानें कितना खतरनाक है यह संक्रमण

गुजरात में एक बार फिर चांदीपुरा वायरस (Chandipura Virus) के मामले सामने आने से स्वास्थ्य विभाग और डॉक्टरों की चिंता बढ़ गई है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, अब तक तीन बच्चों की मौत हो चुकी है. यह वायरस भले ही दुर्लभ (रेयर) हो, लेकिन बच्चों में बेहद तेजी से गंभीर रूप ले सकता है. शुरुआत में इसके लक्षण सामान्य वायरल बुखार जैसे दिखाई देते हैं, लेकिन कुछ ही घंटों या दो-तीन दिनों के भीतर संक्रमण दिमाग तक पहुंचकर जानलेवा साबित हो सकता है। ऐसे में समय पर पहचान और इलाज बेहद जरूरी है.

मानसून में क्यों बढ़ जाता है खतरा?

नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल (NCDC) के अनुसार, भारत में चांदीपुरा वायरस के प्रकोप पहले भी सामने आ चुके हैं. खासतौर पर मानसून के दौरान इसका खतरा बढ़ जाता है, क्योंकि इस मौसम में संक्रमण फैलाने वाली सैंडफ्लाई (रेतीली मक्खी) अधिक सक्रिय हो जाती है.

डॉ. मंजू केदारनाथ के अनुसार, यह संक्रमण दुर्लभ जरूर है, लेकिन इसकी रफ्तार बहुत तेज होती है। इसलिए शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है.

क्या हैं इसके लक्षण?

चांदीपुरा वायरस की शुरुआत तेज बुखार, सिरदर्द, मतली और कमजोरी से होती है. इसके बाद वायरस तेजी से मस्तिष्क को प्रभावित कर सकता है, जिससे उल्टी, बेचैनी, दौरे पड़ना और बेहोशी जैसी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं. यदि समय पर इलाज नहीं मिले तो 48 से 72 घंटे के भीतर मरीज कोमा में जा सकता है और जान का खतरा बढ़ सकता है.

किन लोगों को सबसे ज्यादा खतरा?

डॉक्टरों के अनुसार, 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में इस वायरस का खतरा सबसे अधिक होता है. बच्चों का विकसित हो रहा नर्वस सिस्टम और अपेक्षाकृत कमजोर इम्यून सिस्टम उन्हें गंभीर संक्रमण के प्रति अधिक संवेदनशील बनाता है.

यदि किसी बच्चे को 101 डिग्री फारेनहाइट (38.3 डिग्री सेल्सियस) से अधिक बुखार, बार-बार उल्टी, दौरे, व्यवहार में बदलाव, अत्यधिक सुस्ती या बेहोशी जैसे लक्षण दिखाई दें तो उसे तुरंत अस्पताल ले जाना चाहिए. विशेषज्ञों का कहना है कि शुरुआती कुछ घंटे इलाज के लिए सबसे महत्वपूर्ण होते हैं.

क्या इसका इलाज और बचाव संभव है?

फिलहाल चांदीपुरा वायरस के लिए कोई विशेष एंटीवायरल दवा या वैक्सीन उपलब्ध नहीं है. मरीज को अस्पताल में केवल सहायक उपचार (सपोर्टिव ट्रीटमेंट) दिया जाता है ताकि संक्रमण से होने वाली जटिलताओं को नियंत्रित किया जा सके. रिपोर्ट्स के अनुसार, इस वायरस की मृत्यु दर 56 से 75 प्रतिशत तक दर्ज की गई है.

बचाव के लिए बच्चों को पूरे बाजू के कपड़े पहनाएं, उम्र के अनुसार सुरक्षित इंसेक्ट रिपेलेंट का इस्तेमाल करें और जरूरत पड़ने पर कीटनाशक लगी मच्छरदानी का उपयोग करें. साथ ही घर और आसपास साफ-सफाई रखें, कचरा जमा न होने दें और उन जगहों को साफ रखें जहां सैंडफ्लाई पनप सकती हैं.

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