कैसे तय होती है दवाओं और खाद्य पदार्थों की एक्सपायरी डेट? जानिए इसके पीछे का वैज्ञानिक तरीका
बाजार से दवा, दूध, ब्रेड या कोई भी पैकेज्ड खाद्य पदार्थ खरीदते समय सबसे पहले लोग उसकी एक्सपायरी डेट जरूर देखते हैं. यह तारीख हमारी सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण होती है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि कंपनियों को पहले से कैसे पता चल जाता है कि कोई उत्पाद किस दिन तक सुरक्षित रहेगा? क्या यह केवल अनुमान होता है या इसके पीछे वैज्ञानिक प्रक्रिया काम करती है? दरअसल, दवाओं और खाद्य पदार्थों की एक्सपायरी डेट तय करने के लिए कई तरह के वैज्ञानिक परीक्षण किए जाते हैं, जिनके आधार पर उनकी शेल्फ लाइफ निर्धारित की जाती है.
दवाओं की एक्सपायरी डेट कैसे तय होती है?
दवाओं की एक्सपायरी डेट तय करने के लिए फार्मा कंपनियां स्टेबिलिटी टेस्ट (Stability Test) यानी स्थिरता परीक्षण करती हैं। इस प्रक्रिया में यह जांचा जाता है कि दवा अलग-अलग तापमान, नमी और मौसम में कितने समय तक अपनी प्रभावशीलता बनाए रख सकती है. वैज्ञानिक प्रयोगशाला में दवा के मुख्य एक्टिव इंग्रीडिएंट की रासायनिक क्षमता (Chemical Potency) को मापते हैं। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाता है कि तय समय के बाद दवा बेअसर या शरीर के लिए हानिकारक न बन जाए. सभी सुरक्षा मानकों और परीक्षणों में सफल होने के बाद ही दवा पर एक्सपायरी डेट छापी जाती है.
खाद्य पदार्थों की एक्सपायरी कैसे तय की जाती है?
खाने-पीने की चीजों के लिए नियम थोड़े अलग होते हैं। पैकेट पर अक्सर 'Best Before' और 'Use By' लिखा होता है. Best Before का मतलब है कि उस तारीख तक उत्पाद का स्वाद, रंग और खुशबू सबसे अच्छी रहेगी, हालांकि उसके बाद भी वह कुछ समय तक खाने योग्य हो सकता है। वहीं Use By उन उत्पादों पर लिखा जाता है जो जल्दी खराब होते हैं, जैसे दूध, ब्रेड और मांस. वैज्ञानिक पैकेजिंग की हवा, नमी और रोशनी रोकने की क्षमता का परीक्षण करके यह तय करते हैं कि इनमें बैक्टीरिया या फंगस कब विकसित हो सकते हैं.
रियल टाइम और एक्सीलरेटेड टेस्टिंग का इस्तेमाल
कंपनियां उत्पाद की शेल्फ लाइफ जानने के लिए दो प्रमुख तरीके अपनाती हैं. पहला रियल टाइम टेस्टिंग, जिसमें उत्पाद को सामान्य तापमान और नमी में लंबे समय तक रखकर उसकी गुणवत्ता की जांच की जाती है। दूसरा एक्सीलरेटेड टेस्टिंग, जिसमें उत्पाद को लगभग 40 डिग्री सेल्सियस तापमान और 75 प्रतिशत नमी जैसी कठिन परिस्थितियों में रखा जाता है. इससे वैज्ञानिक कम समय में यह समझ जाते हैं कि सामान्य परिस्थितियों में उत्पाद कितने महीनों या वर्षों तक सुरक्षित रहेगा.
बैक्टीरिया और गुणवत्ता की भी होती है जांच
खाद्य पदार्थों की एक्सपायरी तय करने में माइक्रोबायोलॉजिकल टेस्ट भी अहम भूमिका निभाता है. इसमें यह देखा जाता है कि समय के साथ भोजन में बैक्टीरिया, फंगस या खमीर कितनी तेजी से बढ़ रहे हैं. इसके अलावा सेंसरी इवैल्यूएशन के जरिए विशेषज्ञ उत्पाद के रंग, गंध, स्वाद और बनावट में आने वाले बदलावों का मूल्यांकन करते हैं। इन सभी वैज्ञानिक परीक्षणों के आधार पर ही किसी उत्पाद की एक्सपायरी डेट तय की जाती है.
दवाओं और खाद्य पदार्थों पर लिखी एक्सपायरी डेट कोई अनुमान नहीं, बल्कि वैज्ञानिक परीक्षणों का परिणाम होती है. स्टेबिलिटी टेस्ट, रियल टाइम और एक्सीलरेटेड टेस्टिंग, माइक्रोबायोलॉजिकल जांच और गुणवत्ता मूल्यांकन जैसे कई चरणों से गुजरने के बाद ही कंपनियां किसी उत्पाद की सुरक्षित शेल्फ लाइफ तय करती हैं. इसलिए उपभोक्ताओं को हमेशा एक्सपायरी डेट देखकर ही दवा या खाद्य पदार्थ का उपयोग करना चाहिए, ताकि स्वास्थ्य से जुड़ा कोई जोखिम न हो.
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