सोनम वांगचुक से गांधी तक: भारत में भूख हड़ताल का इतिहास, जब अनशन से बदली राजनीति की दिशा

भारत में भूख हड़ताल यानी अनशन लंबे समय से विरोध और जनआंदोलन का एक प्रभावशाली तरीका रहा है। महात्मा गांधी के सत्याग्रह से लेकर अन्ना हजारे और सोनम वांगचुक के आंदोलनों तक, कई बार अनशन ने सरकारों का ध्यान खींचा और बड़े राजनीतिक फैसलों को प्रभावित किया। हाल ही में दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनशन के 21वें दिन एक्टिविस्ट और शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक को मेडिकल निगरानी के लिए दिल्ली पुलिस अस्पताल ले गई। वह नीट यूजी पेपर लीक मामले को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग करते हुए भूख हड़ताल कर रहे थे।

महात्मा गांधी और सत्याग्रह के रूप में भूख हड़ताल

महात्मा गांधी ने भूख हड़ताल को अहिंसक आंदोलन के एक नैतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। 1918 में अहमदाबाद मिल श्रमिकों की हड़ताल के दौरान उन्होंने कपड़ा मजदूरों के लिए उचित वेतन की मांग को लेकर अनशन किया था। इसके बाद मिल मालिकों को श्रमिकों की मांग स्वीकार करनी पड़ी।

1932 में गांधी ने ब्रिटिश सरकार के कम्युनल अवॉर्ड के विरोध में यरवदा जेल में आमरण अनशन शुरू किया। इस आंदोलन का अंत गांधी और डॉ. भीमराव अंबेडकर के बीच हुए ऐतिहासिक पूना पैक्ट के साथ हुआ। आजादी के बाद 1947-48 में भी गांधी ने कोलकाता और दिल्ली में सांप्रदायिक हिंसा रोकने और शांति स्थापित करने के लिए भूख हड़ताल की।

भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त का जेल अनशन

स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने लाहौर जेल में भारतीय राजनीतिक कैदियों के साथ समान व्यवहार की मांग को लेकर 116 दिनों तक भूख हड़ताल की थी। उन्होंने बेहतर भोजन, जेल की सुविधाओं और ब्रिटिश कैदियों के समान अधिकार की मांग उठाई थी। उनके आंदोलन को देशभर में समर्थन मिला और ब्रिटिश सरकार पर दबाव बढ़ा।

पोटी श्रीरामुलु का बलिदान

आजादी के बाद पोटी श्रीरामुलु ने तेलुगु भाषी लोगों के लिए अलग राज्य की मांग को लेकर अनिश्चितकालीन अनशन किया। दिसंबर 1952 में 58 दिनों की भूख हड़ताल के बाद उनकी मृत्यु हो गई। इसके बाद बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए और 1953 में आंध्र प्रदेश राज्य के गठन की घोषणा की गई। यह भाषाई आधार पर बनने वाला भारत का पहला राज्य था।

लद्दाख और सोनम वांगचुक परिवार का आंदोलन

1984 में लद्दाख के प्रमुख नेता और सोनम वांगचुक के पिता सोनम वांग्याल ने लद्दाख के समुदायों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की मांग को लेकर पांच दिन का अनशन किया था। आंदोलन के प्रभाव के कारण तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लेह का दौरा किया और उन्हें अनशन समाप्त करने के लिए मनाया। बाद में 1989 में लद्दाख को अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिला।

ममता बनर्जी, मेधा पाटकर और अन्ना हजारे का अनशन

2006 में ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल के सिंगुर में टाटा नैनो परियोजना के लिए जमीन अधिग्रहण के विरोध में 26 दिनों तक भूख हड़ताल की थी। वहीं सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने नर्मदा बचाओ आंदोलन के दौरान 20 दिनों का अनशन किया और विस्थापित परिवारों के पुनर्वास की मांग उठाई।

2011 में अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने पूरे देश का ध्यान खींचा। जन लोकपाल बिल की मांग को लेकर उनके अनिश्चितकालीन अनशन ने सरकार पर राजनीतिक दबाव बनाया और देशभर में बड़े स्तर पर आंदोलन हुए।

सोनम वांगचुक का हालिया अनशन

सोनम वांगचुक ने 2024 में लद्दाख के पर्यावरण संरक्षण, राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग को लेकर 21 दिनों का क्लाइमेट फास्ट किया था। जुलाई 2026 में उन्होंने जंतर-मंतर पर नीट यूजी परीक्षा में कथित अनियमितताओं के खिलाफ छात्रों के समर्थन में अनिश्चितकालीन अनशन शुरू किया।

भारत के इतिहास में भूख हड़ताल केवल विरोध का तरीका नहीं रही, बल्कि कई बार सामाजिक और राजनीतिक बदलाव का माध्यम बनी है। गांधी से लेकर वांगचुक तक, अनशन ने जनभावनाओं को आवाज दी और सरकारों को कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर प्रतिक्रिया देने के लिए मजबूर किया।

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