पीएम आवास तक पैदल मार्च: क्या छात्रों के मुद्दे पर कांग्रेस ने चली बड़ी सियासी चाल?

21 जुलाई की दोपहर दिल्ली की राजनीति में अचानक हलचल तेज हो गई। बिना किसी बड़े ऐलान और बिना मीडिया को पहले से जानकारी दिए कांग्रेस के शीर्ष नेता राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे समेत कई नेता अचानक पैदल प्रधानमंत्री आवास की ओर बढ़ने लगे।

यह कोई सामान्य राजनीतिक प्रदर्शन नहीं था। भारतीय राजनीति में विरोध प्रदर्शन आमतौर पर जंतर-मंतर, संसद मार्ग या किसी सार्वजनिक स्थान पर होते रहे हैं, लेकिन प्रधानमंत्री आवास तक मार्च करने की कोशिश अपने आप में एक बड़ा राजनीतिक संदेश मानी जाती है।

कुछ ही घंटों में यह शांत दिखने वाला घटनाक्रम राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया। पुलिस की कार्रवाई हुई, नेताओं को रोका गया और कांग्रेस ने इसे छात्रों की आवाज दबाने का मुद्दा बना दिया। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के पीछे कांग्रेस की रणनीति क्या थी, यह सवाल अब राजनीतिक गलियारों में चर्चा का केंद्र है।

क्या राहुल गांधी ने छात्रों के आंदोलन को अपने राजनीतिक एजेंडे से जोड़ने की कोशिश की? क्या पेपर लीक और परीक्षा व्यवस्था का मुद्दा अब विपक्ष के बड़े आंदोलन का रूप लेने जा रहा है? या फिर कांग्रेस को यह चिंता थी कि युवाओं से जुड़े इस मुद्दे का राजनीतिक फायदा कोई और दल न उठा ले?

इन सवालों के जवाब के लिए घटनाक्रम को थोड़ा पीछे समझना होगा।

पेपर लीक और परीक्षा व्यवस्था को लेकर विपक्ष से जुड़े कई नेता 20 जून से जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे थे। आम आदमी पार्टी और अन्य विपक्षी दल इस मुद्दे पर सक्रिय नजर आ रहे थे, जबकि कांग्रेस शुरुआती दौर में इस आंदोलन से दूरी बनाए हुए थी।

हालांकि कांग्रेस पहले से ही NEET पेपर लीक और छात्रों के भविष्य से जुड़े मुद्दों को उठाती रही थी। राहुल गांधी लगातार सरकार पर सवाल खड़े कर रहे थे और युवाओं से जुड़े मुद्दों को अपनी राजनीति के केंद्र में रखने की कोशिश कर रहे थे।

17 जुलाई को देहरादून में राहुल गांधी ने छात्रों के साथ एक कार्यक्रम किया, जहां उन्होंने पेपर लीक के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया। कांग्रेस ने इस कार्यक्रम की तैयारी भी की थी, लेकिन इसे अपेक्षित राजनीतिक चर्चा नहीं मिल सकी।

इसके बाद जैसे-जैसे छात्रों का आंदोलन तेज हुआ, कांग्रेस भी इस मुद्दे पर सक्रिय होती दिखाई देने लगी।

प्रदर्शनकारियों पर हुई पुलिस कार्रवाई ने कांग्रेस को सरकार पर हमला करने का एक बड़ा अवसर दे दिया। प्रियंका गांधी ने आरोप लगाया कि छात्रों की मांगों पर बातचीत करने के बजाय सरकार बल प्रयोग कर रही है। राहुल गांधी ने भी सोशल मीडिया के माध्यम से सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि युवाओं के सवालों का जवाब दमन से नहीं दिया जा सकता।

इसके बाद राहुल गांधी और प्रियंका गांधी घायल छात्रों से मिलने अस्पताल पहुंचे। लेकिन इसके अगले ही दिन कांग्रेस ने एक ऐसा कदम उठाया, जिसने राजनीतिक हलकों में चर्चा बढ़ा दी।

बताया गया कि कांग्रेस ने प्रधानमंत्री आवास के बाहर प्रदर्शन की योजना बेहद गोपनीय तरीके से बनाई। नेताओं को मल्लिकार्जुन खड़गे के जन्मदिन के बहाने बुलाया गया और इसके बाद राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और अन्य नेता पैदल प्रधानमंत्री आवास की ओर निकल पड़े।

देखते ही देखते यह प्रदर्शन राजनीतिक टकराव में बदल गया। पुलिस ने नेताओं को रोका और उन्हें वहां से हटाया गया। राहुल गांधी ने बाद में कहा कि उनका उद्देश्य प्रधानमंत्री से छात्रों के मुद्दों पर जवाब मांगना था।

इस पूरे घटनाक्रम में विपक्ष के दूसरे नेताओं की भूमिका भी चर्चा में रही। अखिलेश यादव समेत कई विपक्षी नेताओं ने भी छात्रों से जुड़े मुद्दों पर सरकार को घेरा।

अब सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ छात्रों के मुद्दे पर एक विरोध प्रदर्शन था या फिर विपक्ष युवाओं से जुड़े मुद्दों को लेकर एक बड़ा राजनीतिक अभियान तैयार कर रहा है?

भारतीय राजनीति में अक्सर कोई मुद्दा सिर्फ मुद्दा नहीं रहता। वह धीरे-धीरे एक बड़े राजनीतिक संदेश में बदल जाता है। पेपर लीक और परीक्षा व्यवस्था का मुद्दा भी अब उसी दिशा में बढ़ता दिखाई दे रहा है, जहां छात्र, युवा और रोजगार जैसे सवाल आने वाले समय की राजनीति को प्रभावित कर सकते हैं।

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