परीक्षा सुधार विधेयक पर लोकसभा में सियासी घमासान, गौरव गोगोई ने उठाए NTA की जवाबदेही पर सवाल
संसद के मानसून सत्र के सातवें दिन लोकसभा में परीक्षा सुधारों से जुड़े पब्लिक एग्जामिनेशंस (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) संशोधन विधेयक, 2026 पर चर्चा हुई। इस दौरान सत्ता पक्ष ने पेपर लीक और परीक्षा माफिया पर लगाम लगाने के लिए इसे जरूरी कदम बताया, जबकि विपक्ष ने सरकार की नीयत और पहले उठाए गए कदमों की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े किए। चर्चा के दौरान कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) की कार्यप्रणाली को लेकर कई सवाल उठाए और सरकार से जवाब मांगा।
बांसुरी स्वराज ने बताया समय की जरूरत
भाजपा सांसद बांसुरी स्वराज ने विधेयक का समर्थन करते हुए कहा कि आज के समय में परीक्षा माफिया एक संगठित रूप ले चुका है और उससे निपटने के लिए कड़े कानून की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि यह विधेयक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार की संवेदनशीलता को दर्शाता है।
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि पेपर लीक एक गंभीर अपराध है। नए संशोधन के तहत केंद्र सरकार को विशेष टास्क फोर्स बनाने का अधिकार मिलेगा। साथ ही जांच एजेंसियों को दो महीने के भीतर जांच पूरी करने और ट्रायल कोर्ट को तीन महीने के भीतर फैसला सुनाने का प्रावधान किया गया है।
बांसुरी स्वराज ने कहा कि सरकार का उद्देश्य विद्यार्थियों को तनाव मुक्त वातावरण देना है। उन्होंने प्रधानमंत्री के कार्यक्रम ‘परीक्षा पे चर्चा’ का भी उल्लेख किया और कहा कि सरकार चाहती है कि विद्यार्थी परीक्षा के दबाव में टूटने के बजाय आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ें।
गौरव गोगोई ने NTA की संरचना पर उठाए सवाल
कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने लोकसभा में सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि सरकार परीक्षा व्यवस्था में वास्तविक सुधार नहीं कर रही है, बल्कि केवल दिखावा कर रही है।
उन्होंने NTA से जुड़े आंकड़ों पर सवाल उठाते हुए कहा कि सरकार ने 47 अधिकारियों पर कार्रवाई की बात कही है, लेकिन NTA में स्वीकृत पदों की संख्या केवल 34 है और इनमें भी कई पद खाली हैं। ऐसे में 47 अधिकारियों पर कार्रवाई का दावा कैसे किया जा रहा है, यह स्पष्ट किया जाना चाहिए।
गोगोई ने यह भी सवाल उठाया कि NTA के महानिदेशक को बदला गया, लेकिन चेयरमैन को पद पर बनाए रखा गया। उन्होंने पूछा कि चेयरमैन पर सरकार इतना भरोसा क्यों जता रही है।
पेपर लीक और पुराने कानून पर विपक्ष का हमला
गौरव गोगोई ने कहा कि वर्ष 2024 में कानून बनाए जाने के बावजूद वर्ष 2026 में भी पेपर लीक की घटनाएं सामने आईं। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार पहले भी इन मामलों को गंभीरता से नहीं लेती रही है।
उन्होंने नीट पेपर लीक मामले का जिक्र करते हुए कहा कि कई आरोपी लंबे समय तक बाहर रहे और कई को जमानत मिल गई। गोगोई ने कहा कि केवल कानून बनाने से समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही लानी होगी।
उन्होंने सरकार पर आरोप लगाया कि शिक्षा व्यवस्था को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त करने की जरूरत है। साथ ही उन्होंने छात्र आंदोलनों के दौरान पुलिस कार्रवाई को लेकर भी सवाल उठाए और गृह मंत्री से जवाब मांगा।
छात्र आंदोलन और पुलिस कार्रवाई का मुद्दा
गोगोई ने जंतर-मंतर पर हुए छात्र प्रदर्शन का उल्लेख करते हुए कहा कि छात्रों ने अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाई। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने बल प्रयोग किया और कुछ गंभीर घटनाएं हुईं। उन्होंने कहा कि इन मामलों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता और सरकार को जवाब देना चाहिए।
उन्होंने शायर वसीम बरेलवी की पंक्तियों का उल्लेख करते हुए कहा कि जब सिद्धांतों पर आंच आती है तो विरोध करना जरूरी हो जाता है।
सरकार ने बताया तेज न्याय का प्रावधान
केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने विपक्ष के आरोपों का जवाब देते हुए कहा कि सरकार पेपर लीक मामलों में तेजी से न्याय सुनिश्चित करने के लिए संशोधन विधेयक ला रही है।
उन्होंने कहा कि नए प्रावधानों के अनुसार जांच दो महीने में पूरी करनी होगी और ट्रायल तीन महीने में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। इस तरह घटना से अंतिम फैसले तक पूरी प्रक्रिया लगभग पांच महीने में पूरी करने का प्रयास किया जाएगा।
उन्होंने बताया कि फैसले के खिलाफ अपील के लिए 30 दिनों का समय दिया जाएगा और हाईकोर्ट में ऐसे मामलों की सुनवाई डबल बेंच से नीचे नहीं होगी।
सरकार का दावा- सुधारों पर लगातार काम जारी
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि सरकार ने परीक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए कई कदम उठाए हैं। उन्होंने बताया कि नंदन नीलेकणि की अध्यक्षता में टास्क फोर्स बनाई गई है और राधाकृष्णन समिति की 46 प्रमुख सिफारिशों में से 35 को लागू किया जा चुका है।
उन्होंने कहा कि यह विधेयक परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और निष्पक्षता लाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। वहीं विपक्ष का कहना है कि केवल कानून बनाने के बजाय व्यवस्था में जवाबदेही तय करना जरूरी है।
लोकसभा में हुई बहस से साफ है कि परीक्षा सुधार का मुद्दा केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक बहस का केंद्र भी बन चुका है। सरकार इसे सख्त कानून के जरिए समाधान की दिशा में कदम बता रही है, जबकि विपक्ष इसे पुरानी समस्याओं के समाधान में सरकार की विफलता से जोड़ रहा है।
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