भारतभूषण अग्रवाल की दृष्टि में “जागते रहो!”
भारतभूषण अग्रवाल की कविता “जागते रहो!” एक प्रेरणादायी रचना है, जिसे उनकी पुण्यतिथि पर विशेष रूप से याद किया जाता है और जिसके माध्यम से कवि ने जागरूक जीवन का संदेश दिया —
डूबता दिन, भीगती-सी शाम
बंद कर दो काम,
लो विश्राम।
यह तिमिर की शाल
ओढ़ लो वसुधे! न सिकुड़े शीत से यह लाल,
जग का बाल।
वलय की खनकार,
दीप बालो री सुहागिनि! जग उठे गृह-द्वार
बंदनवार।
किंतु साथी! देख
हम न सोएँगे, हमारा कार्य है अवशिष्ट
अपनी प्रगति का अब भी अधूरा लेख
जागरण, चिर जागरण ही है हमारा इष्ट!
लो, क्षितिज के पास—
वह उठा तारा, अरे! वह लाल तारा, नयन का तारा हमारा
सर्वहारा का सहारा
विजय का विश्वास।
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