प्रसिद्ध गीतकार भरत व्यास: हिंदी फ़िल्मों के अमर कवि
हिंदी फ़िल्म जगत के प्रसिद्ध गीतकार भरत व्यास का जन्म 6 जनवरी 1918 को बीकानेर में हुआ था। चूरू के पुष्करणा ब्राह्मण परिवार में जन्मे भरत व्यास ने बचपन से ही कविता और गीत लेखन में अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। पिता के छोटे उम्र में निधन के बावजूद उन्होंने कठिन परिस्थितियों को पार कर शिक्षा और कला दोनों में उत्कृष्टता प्राप्त की।
भरत व्यास ने चूरू में अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी की और आगे की पढ़ाई के लिए बीकानेर के डूंगर कॉलेज में प्रवेश लिया। स्कूल और कॉलेज के दौरान ही उन्होंने तुकबंदी और फ़िल्मी गीतों की पैरोडी में दक्षता हासिल कर ली। कॉलेज में वॉलीबाल टीम के कप्तान भी रहे।
रंगमंच के क्षेत्र में भी उन्होंने अपनी प्रतिभा दिखाई। कलकत्ता में उनके नाटक ‘रंगीला मारवाड़’, ‘रामू चन्ना’ और ‘ढोला मरवण’ ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्धि दिलाई। अभिनय के क्षेत्र में उन्होंने ‘मोरध्वज’ जैसी प्रस्तुतियों में अपनी क्षमता का लोहा मनवाया।
फ़िल्म जगत में उनका पदार्पण फ़िल्म ‘दुहाई’ से हुआ। पहले गीत के लिए उन्हें केवल दस रुपए पारिश्रमिक मिला, लेकिन उनका लेखन धीरे-धीरे हिंदी फ़िल्मों में अपनी पहचान बनाने लगा। उनकी लेखनी की खासियत थी हिंदी भाषा का प्रेम और फूहड़ता या अश्लीलता से दूर रहना।
भरत व्यास के कई गीत आज भी लोगों के दिलों में जीवित हैं। उनके प्रमुख गीतों में शामिल हैं:
- ‘आधा है चंद्रमा, रात आधी’ – नवरंग
- ‘जरा सामने तो आओ छलिये’ – जनम-जनम के फेरे
- ‘ऐ मालिक तेरे बंदे हम’ – दो आँखें बारह हाथ
- ‘तुम छुपी हो कहां, मैं तड़पता यहां’ – नवरंग
- ‘जोत से जोत जलाते चलो’ – संत ज्ञानेश्वर
- ‘आ लौट के आजा मेरे मीत’ – रानी रूपमती
भरत व्यास ने अपने गीतों में मानवीय संवेदना, प्रेम, भक्ति और दर्शन का अद्भुत मिश्रण प्रस्तुत किया। उनकी लेखनी ने हिंदी फ़िल्म गीतों में शुद्ध हिंदी के प्रयोग को प्रोत्साहित किया और संगीतकारों जैसे लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, एस. एन. त्रिपाठी, आर. डी. बर्मन, सी. रामचन्द्र आदि के साथ उनकी सफल जोड़ी बनी।
भरत व्यास का निधन 4 जुलाई 1982 को हुआ, लेकिन उनके गीत आज भी लोगों के दिलों में गूंजते हैं और आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करते हैं।


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