अगवाली में पहाड़ पर धमाके, घरों में दरारें और श्मशान तक पहुंच पर सवाल! आखिर प्रशासन की नींद कब टूटेगी?

भरतपुर - अगवाली क्षेत्र में खनन और क्रशर गतिविधियों को लेकर ग्रामीणों का आक्रोश लगातार बढ़ता जा रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि क्षेत्र में लगातार ब्लास्टिंग और खनन गतिविधियों के चलते आसपास के कई मकानों में दरारें पड़ गई हैं। बारिश के मौसम में पहले से कमजोर हो चुके मकानों में रह रहे परिवारों के सामने सुरक्षा का गंभीर सवाल खड़ा हो गया है। ग्रामीणों का कहना है कि ब्लास्टिंग के दौरान घरों में कंपन महसूस होता है और हर धमाके के साथ परिवारों में डर का माहौल पैदा हो जाता है। ग्रामीणों के मुताबिक,कई परिवार ऐसे मकानों में रहने को मजबूर हैं जिनकी दीवारों पर दरारें दिखाई दे रही हैं। ग्रामीणों का कहना है कि घर में खाना बनाते समय भी परिवारों को यह चिंता सताती रहती है कि अचानक ब्लास्टिंग से कोई बड़ा हादसा न हो जाए। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र और आधिकारिक पुष्टि प्रशासनिक एवं तकनीकी जांच के बाद ही हो सकेगी।

लेकिन मामला सिर्फ मकानों की दरारों तक सीमित नहीं है। ग्रामीणों का आरोप है कि शिवालिक सिलिका के खनन क्षेत्र के आगे चौकी और गेट लगा हुआ है तथा उसके भीतर स्थित श्मशान घाट तक शव ले जाने के लिए गेट खुलवाने और अनुमति लेने जैसी स्थिति बनती है। ग्रामीणों का सवाल है कि यदि यह सार्वजनिक श्मशान स्थल है, तो अंतिम संस्कार के लिए ग्रामीणों की निर्बाध और सम्मानजनक पहुंच की व्यवस्था किसकी जिम्मेदारी है? इसी के साथ ग्रामीणों ने चारागाह भूमि को लेकर भी कथित कब्जे या अतिक्रमण के गंभीर आरोप लगाए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि चारागाह भूमि का उपयोग और स्थिति भी जांच का विषय है। इन आरोपों की वास्तविकता राजस्व रिकॉर्ड,मौके के सीमांकन और प्रशासनिक जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकती है।

करीब 49 हेक्टेयर क्षेत्र में खनन, खुदाई की गहराई, ब्लास्टिंग, क्रशर से उड़ने वाली धूल, ओवरलोड वाहनों और सड़क की स्थिति को लेकर भी ग्रामीणों ने सवाल उठाए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि इन गतिविधियों का प्रभाव गांव के जनजीवन और पर्यावरण पर पड़ रहा है। ग्रामीणों ने तहसीलदार को ज्ञापन देकर पूरे मामले की निष्पक्ष और मौके पर जाकर जांच, खनन क्षेत्र का सीमांकन, श्मशान एवं चारागाह भूमि की स्थिति स्पष्ट करने,मकानों का तकनीकी निरीक्षण कराने और नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर जिम्मेदारी तय करने की मांग की है। अब सबसे बड़ा सवाल प्रशासन से है—क्या शिकायत के बाद अधिकारी मौके पर पहुंचेंगे? क्या मकानों की सुरक्षा का तकनीकी आकलन होगा? क्या श्मशान घाट तक ग्रामीणों की निर्बाध पहुंच सुनिश्चित की जाएगी? क्या चारागाह भूमि का राजस्व रिकॉर्ड से मिलान और सीमांकन कराया जाएगा? और अगर कहीं नियमों का उल्लंघन सामने आया तो क्या जिम्मेदारों पर सख्त कार्रवाई होगी? ग्रामीणों का कहना है कि पहले भी शिकायतें की गईं,लेकिन अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई। अब ग्रामीण आंदोलन की चेतावनी दे रहे हैं। अगवाली के ग्रामीणों की मांग साफ है—आरोपों की निष्पक्ष जांच हो, सच्चाई सामने आए और यदि किसी स्तर पर नियमों का उल्लंघन साबित होता है तो जिम्मेदारों पर कार्रवाई हो। अब निगाहें प्रशासन पर हैं—क्या कार्रवाई जमीन पर दिखाई देगी, या शिकायतें एक बार फिर कागजों तक सीमित रह जाएंगी?

रिपोर्टर - देवेन्द्र सिंह सोलंकी 

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