क्या सच में 'फेक' था भरत तिवारी का एनकाउंटर? मां के आरोपों से कांपी सरकार!
कुछ दिन पहले तक जिस एनकाउंटर को भोजपुर पुलिस अपनी पीठ थपथपाने वाली सफल कार्रवाई बता रही थी, आज वही मामला सम्राट सरकार के गले की हड्डी बन चुका है। जी हां 17 जून को शाहपुर इलाके में हुए भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर मामले में अब बाजी पूरी तरह पलट चुकी है। परिजनों के गंभीर आरोप, जनता का बढ़ता आक्रोश, भोजपुरी स्टार पवन सिंह का दखल और सोशल मीडिया पर उठे सवालों के तूफान के बाद सरकार को बैकफुट पर आना पड़ा है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के सीधे हस्तक्षेप के बाद अब खाकी पर हत्या का मुकदमा दर्ज हो चुका है और बड़े अधिकारियों पर गाज गिरनी शुरू हो गई है।
आपको बता दें इस पूरे मामले में मंगलवार और बुधवार को ताबड़तोड़ एक्शन देखने को मिला। मृतक भरत तिवारी की मां आशा देवी के आवेदन पर एनकाउंटर में शामिल पुलिस टीम के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज किया गया। एफआईआर दर्ज होने के अगले ही दिन सरकार ने बड़ा प्रशासनिक हंटर चलाते हुए जगदीशपुर के SDPO राजेश वर्मा को पद से हटा दिया और उन्हें पुलिस मुख्यालय से अटैच कर दिया। उनकी जगह पंकज मिश्रा को जगदीशपुर का नया SDPO नियुक्त किया गया है।
वहीं स्थानीय लोग अब खुलकर सवाल उठा रहे हैं कि अगर पुलिस की थ्योरी पूरी तरह साफ और सही थी, तो फिर इतने बड़े स्तर पर अधिकारियों को हटाने और उन पर मर्डर का केस दर्ज करने की नौबत क्यों आई? परिजनों का दावा है कि पुलिस की टीम 28 वर्षीय भरत तिवारी को अपने साथ जवइनियां गांव लेकर गई थी। वहां भरत ने बकायदा फेसबुक लाइव के जरिए अपनी बात जनता के सामने रखी और उसके बाद अपने हथियार छोड़कर पुलिस के सामने पूरी तरह आत्मसमर्पण कर दिया था। मां का आरोप है कि हथियार डालने और सरेंडर करने के बावजूद पुलिस ने उसे नहीं छोड़ा और घेरकर उसकी जान ले ली। इतना ही नहीं घटना के बाद भरत के पिता काशीनाथ तिवारी को पूरे दिन थाने में अवैध रूप से बैठाकर रखा गया और काफी देर बाद परिवार को मौत की सूचना दी गई।
आपको बता दें शाहपुर प्रखंड के बिलौती गांव के रहने वाले 28 वर्षीय भरत भूषण तिवारी कोई साधारण युवक नहीं थे। सोशल मीडिया, खासकर फेसबुक पर उनकी जबरदस्त फैन फॉलोइंग थी। ग्रामीणों और समर्थकों के मुताबिक, भरत इलाके में सड़क, बिजली, साफ पानी, बाढ़ प्रभावितों के पुनर्वास और सोन नदी के किनारे बसे गांवों की समस्याओं को लेकर लगातार जमीनी और डिजिटल लड़ाई लड़ रहे थे। वह अक्सर स्थानीय भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही के खिलाफ खुलकर वीडियो बनाते थे और लिखते थे। फिलहाल अब देखना यह है कि न्यायिक जांच की आंच में भोजपुर पुलिस के कौन-कौन से बड़े चेहरे झुलसते हैं और पीड़ित परिवार को न्याय कब तक मिलता है।
No Previous Comments found.