शिवरात्रि का त्यौहार और शिव-पार्वती विवाह महोत्सव

बिहार - शिवरात्रि हिंदू धर्म का एक अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण पर्व है। यह भगवान शिव की आराधना और उपासना का विशेष दिन माना जाता है। वर्ष भर में कई शिवरात्रियाँ आती हैं, परंतु फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को आने वाली महाशिवरात्रि सबसे अधिक महत्वपूर्ण होती है। इस दिन श्रद्धालु व्रत रखते हैं, रात्रि जागरण करते हैं और शिवलिंग की विधिपूर्वक पूजा करते हैं। शिवरात्रि का धार्मिक महत्व शिवरात्रि का अर्थ है “शिव की रात्रि”। मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था, इसलिए यह पर्व विवाह, प्रेम और समर्पण का प्रतीक भी माना जाता है।

एक अन्य मान्यता के अनुसार इसी दिन भगवान शिव ने सृष्टि के कल्याण के लिए विष का पान किया था, जिससे संसार की रक्षा हुई। इसलिए शिव को “नीलकंठ” भी कहा जाता है। शिवरात्रि आध्यात्मिक जागरण का भी प्रतीक है। माना जाता है कि इस दिन मनुष्य अपने भीतर के अज्ञान और अहंकार को त्यागकर आत्मिक शुद्धि प्राप्त कर सकता है।
पूजा-विधि और अनुष्ठान शिवरात्रि के दिन श्रद्धालु प्रातः स्नान कर व्रत का संकल्प लेते हैं। मंदिरों में शिवलिंग पर जल, दूध, दही, शहद, बेलपत्र, धतूरा आदि अर्पित किए जाते हैं। भक्त “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जाप करते हैं और पूरी रात जागरण कर भजन-कीर्तन करते हैं। कुछ लोग निर्जल व्रत रखते हैं, जबकि कुछ फलाहार करते हैं। शिवरात्रि की आध्यात्मिक शिक्षा यह पर्व हमें सिखाता है कि जीवन में संयम, साधना और आत्मचिंतन कितना महत्वपूर्ण है। शिवरात्रि केवल पूजा का दिन नहीं, बल्कि आत्मानुशासन और मन की शुद्धि का अवसर भी है। भगवान शिव का सरल, शांत और वैरागी स्वरूप हमें विनम्रता और संतुलन का संदेश देता है। भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिकता और आस्था का अद्भुत संगम है। यह केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि जीवन में प्रेम, तप, संयम और दिव्यता के मिलन का प्रतीक भी है। यह दिन भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य मिलन की स्मृति में मनाया जाता है और भक्तों के लिए आत्मशुद्धि, साधना और भक्ति का महान अवसर बन जाता है।
शिवरात्रि का आध्यात्मिक महत्व शिवरात्रि का अर्थ है — शिव की रात्रि। मान्यता है कि इस रात सृष्टि के मूल तत्त्व जागृत होते हैं और भक्ति करने वाले साधकों को विशेष आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त होती है। हिंदू परंपरा के अनुसार इस पावन रात्रि में भगवान शिव का प्राकट्य हुआ था, और इसी दिन उनका विवाह माता पार्वती से संपन्न हुआ था। इसलिए यह पर्व केवल उपवास या पूजा का दिन नहीं, बल्कि दिव्य प्रेम और शक्ति-तत्त्व के मिलन का उत्सव है। शिव-पार्वती विवाह की पौराणिक कथा
पौराणिक ग्रंथों के अनुसार माता पार्वती, पर्वतराज हिमालय की पुत्री थीं। उन्होंने शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की। वर्षों तक कठिन साधना करने के बाद शिव उनकी भक्ति से प्रसन्न हुए और उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया।
कहा जाता है कि शिव का विवाह अत्यंत अनोखा था — उनके बाराती साधु, भूत-प्रेत और योगी थे। यह विवाह हमें सिखाता है कि सच्चा प्रेम बाहरी रूप, वैभव या दिखावे से नहीं, बल्कि समर्पण और आत्मिक जुड़ाव से होता है। शिवरात्रि के प्रमुख अनुष्ठान इस दिन भक्त विशेष श्रद्धा के साथ पूजा-अर्चना करते हैं— व्रत और उपवास रखा जाता है रात्रि जागरण और भजन-कीर्तन होते हैं शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र अर्पित किए जाते हैं “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जप किया जाता है
मान्यता है कि इस दिन की गई भक्ति जीवन के कष्टों को दूर करती है और मन को शांति देती है। शिव-पार्वती विवाह महोत्सव की परंपरा भारत के कई मंदिरों में शिवरात्रि पर शिव-पार्वती विवाह का प्रतीकात्मक आयोजन किया जाता है। इसमें बारात, विवाह मंडप और वैदिक मंत्रों के साथ दिव्य विवाह का दृश्य प्रस्तुत किया जाता है।
विशेष रूप से इन पवित्र स्थलों पर भव्य आयोजन होते हैं—
काशी विश्वनाथ मंदिर
केदारनाथ मंदिर
अमरनाथ गुफा मंदिर
यहाँ हजारों श्रद्धालु इस दिव्य विवाह के साक्षी बनते हैं और आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
कैलाश का दिव्य महत्व
मान्यता है कि शिव और पार्वती का निवास कैलाश पर्वत पर है। यह पर्वत तप, ध्यान और दिव्यता का प्रतीक माना जाता है। शिवरात्रि के दिन भक्त इस दिव्य धाम को स्मरण कर मन ही मन प्रणाम करते हैं।
 सांस्कृतिक और सामाजिक संदेश
शिव-पार्वती विवाह हमें कई गहरे जीवन-संदेश देता है—
तपस्या और धैर्य से हर लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है
प्रेम में समर्पण और समानता आवश्यक है
शक्ति और चेतना का संतुलन ही सृष्टि को संचालित करता है
सरलता और त्याग जीवन को महान बनाते हैं
शिवरात्रि और शिव-पार्वती विवाह महोत्सव केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि जीवन के गहन सत्य का प्रतीक है। यह हमें सिखाता है कि प्रेम, तपस्या और विश्वास से जीवन में संतुलन और शांति प्राप्त की जा सकती है।
जब भक्त इस पावन रात में दीप जलाकर, मंत्र जपकर और ध्यान करके शिव का स्मरण करते हैं, तो उनके भीतर भी एक नई चेतना जागृत होती है — वही चेतना जो सृष्टि के मूल में है।
अगर आप चाहें तो मैं इस विषय पर भाषण, निबंध, कविता, या शिवरात्रि शुभकामना संदेश भी लिख सकता हूँ।
शिवरात्रि केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आत्मिक उन्नति और सकारात्मक परिवर्तन का अवसर है। यह हमें सादगी, करुणा और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
भगवान शिव की आराधना से जीवन में शांति, शक्ति और संतुलन प्राप्त होता है — यही इस पावन पर्व का वास्तविक संदेश है।

लेखिका - सुनीता कुमारी

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