छठ के बाद बिहार: कौन जीतेगा प्रवासियों का दिल और वोट?

छठ का सूरज डूबेगा और वोटों का महासंग्राम शुरू होगा! बिहार लौटे प्रवासी अब किसके साथ जाएंगे नीतीश-मोदी या तेजस्वी...कौन उन्हें घर तक बुला रहा है और कौन उनके दिल में घर बना रहा है? जी हां छठ के बाद बिहार लौटे लाखों प्रवासी वोटर के हाथ में चुनाव का असली असर है। पिछले चुनावों में प्रवासी वोटर्स ने NDA को बड़ा फायदा पहुंचाया है, इस बार क्या वही कहानी दोहराई जाएगी? या महागठबंधन अपनी तैयारियों से पलटवार करेगा? कौन जीतेगा प्रवासियों का दिल और वोट? आइए जानते हैं...

बिहार के चुनाव में इस बार प्रवासी बिहारी वोटर फिर वही पुराना लेकिन निर्णायक चेहरा उभर कर सामने आया है। ये वही लोग हैं जो दिल्ली, गुजरात, मुंबई, पंजाब, हरियाणा में पसीना बहाते हैं, पर वोट देने के लिए सैकड़ों किलोमीटर का सफर तय करके अपने गांव लौटते हैं। ऐसे में ये जानना जरुरी है कि बिहार में कितने प्रवासी वोटर्स हैं? बिहार आर्थिक सर्वे 2024 के मुताबिक....

3 करोड़ से ज्यादा बिहारी रोजगार के लिए देशभर में फैले हैं।

इनमें करीब 50 लाख पंजीकृत मतदाता हैं जो निर्वाचन आयोग की वोटर लिस्ट में शामिल हैं।

दिल्ली-NCR में सबसे ज्यादा-12%,

गुजरात में 8%, महाराष्ट्र 7%, हरियाणा 5%, और पंजाब 4% बिहारी कामगार रहते हैं।

इन आंकड़ों से मतलब साफ है कि ज्यादातर प्रवासी बिहारी बीजेपी शासित राज्यों में हैं! और यही वजह है कि एनडीए पहले से ही इस गेम की स्क्रिप्ट लिख चुकी है। आपको बता दें छठ पूजा के दौरान IRCTC ने 200 से ज़्यादा स्पेशल ट्रेनें चलाई, जहां 1 करोड़ से अधिक यात्रियों की बुकिंग हुई। पिछले आंकड़े बताते हैं कि हर बार करीब 25 से 30 लाख प्रवासी वोटर घर लौटकर वोट डालते हैं। लेकिन इस बार मुश्किल है कि छठ के बाद पहले चरण का मतदान 6 नवंबर को है, यानी लगभग 9-10 दिन का गैप है। ऐसे में अब सवाल है कि क्या कोई कामगार इतना लंबा टाइम सिर्फ वोट डालने के लिए रुकेगा? क्या दिहाड़ी मजदूर, चायवाला, सब्जीवाला अपना रोज का नुकसान करेगा? चौंकाने वाली बात ये है कि करीब 30 लाख प्रवासी फिर भी रुकते हैं! इतिहास गवाह है...

2005 में प्रवासी वोटिंग बढ़ी-NDA की जीत
2010 में प्रवासी रुके-नीतीश दोबारा सत्ता में
2020 में छठ के साथ वोटिंग-NDA को 125 सीटें

ये आंकड़े बताते हैं कि बीजेपी ने इसे मिशन प्रवासी बिहारी बना दिया है। जुलाई से ही 70 शहरों दिल्ली, मुंबई, सूरत, वडोदरा, गुरुग्राम में प्रवासी वोटरों से मुलाकात, चाय पर चर्चा, मिट्टी की खुशबू अभियान, सब चल रहा है। 54 सीनियर नेताओं को जिम्मेदारी दी गई है कि हर राज्य से वोटर घर पहुंचें। फ्री ट्रेन, बस और पेड छुट्टी दिलवाने तक का प्लान है।
सोशल मीडिया पर 2 करोड़ प्रवासियों तक पहुंचने के लिए Bihar First कैंपेन चलाया जा रहा है। छठ के दो दिन बाद अमित शाह खुद प्रवासियों के डोर-टू-डोर मिशन की शुरुआत करेंगे। वहीं दूसरी तरफ JDU का EBC और महिला वोटर्स पर फोकस है। नीतीश कुमार ने प्रवासी महिलाओं और EBC तबके को टारगेट किया है। 125 यूनिट फ्री बिजली, महिलाओं को स्वरोजगार और लव-कुश समीकरण से OBC प्रवासियों को साधने की कोशिश है। तो वहीं तेजस्वी कह रहे हैं कि अगर नौकरी होती तो प्रवासी बनना नहीं पड़ता! उनका नारा है--हर घर एक नौकरी। इसलिए वोटर अधिकार यात्रा के जरिए RJD समझा रही है कि प्रवासी वोटर रुके, वोट डाले और बदलाव लाए। तो वहीं इस रेस में जन सुराज प्रमुख प्रशांत किशोर भी पीछे नहीं है। प्रशांत किशोर एक साल में पलायन खत्म करने का वादा कर नए वोटरों और पढ़े-लिखे प्रवासियों को टारगेट कर रहे हैं। उनकी टीम जन संवाद यात्रा के जरिए हर राज्य में प्रवासी संपर्क अभियान चला रही है।

कुल मिलाकर देखा जाए तो बिहार का वोटर चाहे 10 साल से बाहर हो या 20 साल से...वोट डालते वक्त जाति ही प्राथमिकता रहती है। दिल्ली, सूरत, मुंबई में यादव महासभा, कुशवाहा समाज, कुर्मी संघ जैसी जातीय संस्थाएँ साफ तौर पर वोटिंग डायरेक्शन देती रहती हैं। और जाति के बाद आता है संसाधन का खेल और इस मैदान में NDA सबसे आगे है। बीजेपी-जेडीयू गठबंधन का चुनावी बजट महागठबंधन से 3-4 गुना बड़ा है। केंद्र की योजनाओं...PM आवास, उज्ज्वला, सड़क, गैस, बिजली और मोदी ब्रांड की अपील प्रवासियों तक सीधे पहुंचाई जा रही है।

तो तस्वीर साफ है कि बिहार की राजनीति फिर लौट आई है उसी ट्रैक पर जहां ट्रेनें सिर्फ पटना की ओर नहीं, बल्कि सत्ता की ओर दौड़ रही हैं। छठ के बाद लौटे प्रवासियों के हाथ में इस बार फिर राजनीति की कमान है। ऐसे में कौन विकास की रेल या भावनाओं की नाव जीतेगा? ये जवाब तो 14 नवंबर की शाम तक मिलेगा, जब बिहार में सिर्फ सूरज नहीं, सत्ता का सूरज भी उगेगा या डूबेगा! 

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