बिहार में मुस्लिम आबादी: 18% सच या झूठ?
राजनीतिक चर्चा में अक्सर यह कहा जाता है कि बिहार में मुस्लिम समुदाय 18 फीसदी है, इसलिए उन्हें ज्यादा टिकट क्यों नहीं मिलते या महागठबंधन में मुस्लिम उपमुख्यमंत्री क्यों नहीं है। लेकिन असली स्थिति थोड़ी अलग है। बिहार में 38 जिले हैं और ये 9 प्रमंडलों में बंटे हुए हैं। गंगा नदी के उत्तर और दक्षिण में मुस्लिम आबादी काफी असमान है।
सीमांचल (पूर्णिया प्रमंडल) में मुस्लिम आबादी बहुत अधिक है।
किशनगंज: 68%
कटिहार: 44%
अररिया: 43%
पूर्णिया: 38%
यानी इन चार जिलों में मुस्लिम वोट बहुत ज्यादा हैं, लेकिन पूरे बिहार में इसका औसत सिर्फ़ 18% ही दिखता है।
तिरहुत प्रमंडल के चार जिलों में भी मुस्लिम आबादी 18% से अधिक है।
दरभंगा, पश्चिम चंपारण, सीतामढ़ी, पूर्वी चंपारण – सभी में 19-22%
बाकी जिलों में मुस्लिम आबादी काफी कम है। उदाहरण के लिए, लखीसराय में सिर्फ़ 4%, शेखपुरा और बक्सर में 6%, नालंदा, जहानाबाद और भोजपुर में 7%। इसलिए पूरे राज्य में औसत 18% आता है।
राजनीतिक गणित भी यही बताता है कि सिर्फ़ संख्या देखकर मुस्लिम समुदाय के लिए अधिक टिकट या उपमुख्यमंत्री पद तय नहीं किया जा सकता। कई इलाकों में मुस्लिम वोट अलग-अलग जातियों में बंटे होते हैं-जैसे किशनगंज में सुरजापुरी, कटिहार में शेरशाहबादी और अररिया में कुल्हैया मुस्लिम। इस कारण, महागठबंधन, AIMIM और JDU अलग-अलग जातियों और इलाकों में अपने उम्मीदवार खड़े करते हैं। इससे यह साफ़ होता है कि बिहार में मुस्लिम समुदाय की संख्या केवल औसत आंकड़ा है, जो पूरे राजनीतिक गणित को सही तरीके से नहीं दर्शाता। हर इलाके की सामाजिक और जातीय संरचना को ध्यान में रखकर पार्टियां अपने उम्मीदवार तय करती हैं। इसलिए यह जरूरी है कि आंकड़ों के पीछे के वास्तविक धरातल को समझा जाए।
अगली बार जब कोई कहे कि बिहार में मुस्लिम समुदाय 18 फीसदी है और उन्हें पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिलता, तो समझ जाइए कि ये केवल औसत आंकड़ा है। असली कहानी हमेशा ज़मीनी गणित और सामाजिक संरचना में छुपी होती है। यही है बिहार की राजनीति की असली तस्वीर।

No Previous Comments found.