बिहार राज्यसभा चुनाव में सस्पेंस: कांग्रेस के विधायक संपर्क से बाहर, क्या बदल जाएगा खेल?
आज बिहार में राज्यसभा की पांच सीटों के लिए मतदान होना है, जिसके लिए विधानसभा में वोटिंग कराई जाएगी। पांचवीं सीट को लेकर महागठबंधन और एनडीए दोनों ही खेमे अपनी-अपनी जीत का दावा कर रहे हैं। इसी बीच कांग्रेस के दो विधायक अचानक संपर्क से बाहर हो गए हैं, जिससे सियासी हलकों में हलचल तेज हो गई है। बताया जा रहा है कि दोनों विधायकों से किसी भी माध्यम से संपर्क नहीं हो पा रहा है।
दरअसल, एनडीए के कुछ नेता पहले से ही यह दावा कर रहे थे कि विपक्ष के कुछ विधायक उनके संपर्क में हैं। ऐसे में मतदान के दिन कांग्रेस के दो विधायकों के अचानक ट्रेसलेस होने से तरह-तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। फारबिसगंज और वाल्मीकिनगर के विधायकों के मोबाइल फोन स्विच ऑफ बताए जा रहे हैं, जिसके बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है।
जानकारी के मुताबिक, फारबिसगंज से विधायक मनोज बिश्वास से संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन उनका फोन भी स्विच ऑफ मिला। वहीं वाल्मीकिनगर सीट से विधायक सुरेंद्र प्रसाद कुशवाहा का मोबाइल भी बंद बताया जा रहा है। दोनों विधायक सोमवार सुबह तक उस होटल में नहीं पहुंचे थे, जहां महागठबंधन के सभी विधायकों को ठहराया गया था। इतना ही नहीं, खबर अपडेट होने तक दोनों विधानसभा में वोट डालने भी नहीं पहुंचे थे।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि राज्यसभा चुनाव के दौरान अक्सर क्रॉस वोटिंग और राजनीतिक समीकरण बदलने की आशंका बनी रहती है। ऐसे में इन दोनों विधायकों के अचानक गायब होने से चर्चाएं और तेज हो गई हैं। हालांकि इस पूरे मामले पर कांग्रेस की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन इस घटनाक्रम के बाद बिहार की राजनीति में हलचल बढ़ गई है। यहां तक कि यह भी चर्चा हो रही है कि दोनों विधायक कांग्रेस का साथ छोड़ सकते हैं।
अगर फारबिसगंज के विधायक मनोज बिश्वास की राजनीतिक पृष्ठभूमि की बात करें तो वे सीमांचल के अररिया जिले से आते हैं और वर्ष 2009 से राजनीति में सक्रिय हैं। शुरुआत में उनका आधार नीतीश कुमार की पार्टी जदयू में रहा, हालांकि बाद में वे राजद से भी जुड़े। वर्ष 2010 में वे जदयू के प्रखंड युवा अध्यक्ष बने और 2012 में पार्टी में सक्रिय भूमिका निभाने लगे। 2017-18 में उन्हें जदयू का प्रदेश अति पिछड़ा वर्ग सचिव बनाया गया।
इसके बाद 2019 में उन्होंने जदयू छोड़कर राजद का दामन थाम लिया और वहां अति पिछड़ा वर्ग के प्रदेश महासचिव बने। 2023 से लेकर 2025 के चुनाव से ठीक पहले तक वे राजद के जिला प्रधान महासचिव रहे। विधानसभा चुनाव से कुछ दिन पहले उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता ली और फारबिसगंज सीट से चुनाव लड़ते हुए 221 वोटों के अंतर से जीत हासिल कर विधायक बने।
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