बिहार का दुर्लभ सांप, विदेशों में भारी मांग, लोग 25 करोड़ तक देने को तैयार
पहले बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड के सूखे इलाकों में रेड सैंड बोआ (Eryx johnii) या ‘दो मुंहा सांप’ आम नजर आता था। इसे ‘दो मुंहा’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसका सिर और पूंछ लगभग एक जैसे दिखते हैं।
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लेकिन अब यह सांप लगभग विलुप्त होने की कगार पर है। इसकी संख्या में गिरावट का मुख्य कारण तस्करी है। विदेशों में इसे काला जादू, तंत्र-मंत्र, धन, सौभाग्य और संपन्नता लाने वाला माना जाता है। यही अंधविश्वास इसे तस्करों के लिए बेहद आकर्षक बनाता है।
संख्या में तेजी से गिरावट
वन्यजीव विशेषज्ञ और वाइल्डलाइफ क्राइम कंट्रोल ब्यूरो (WCCB) की रिपोर्ट बताती है कि पिछले 10 साल में रेड सैंड बोआ की संख्या 90% से अधिक घट चुकी है। यह सांप बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, राजस्थान और गुजरात के रेतीले और सूखे इलाकों में पाया जाता था। अब यह इतना दुर्लभ हो गया है कि ज्यादातर इलाकों में देखना मुश्किल है।

विदेशों में भारी मांग
थाईलैंड, चीन, मलेशिया और यूरोपीय देशों में इसकी डिमांड बहुत अधिक है। तंत्र-मंत्र करने वाले और विदेशी कलेक्टर्स इसे लाखों या करोड़ों में खरीदते हैं। वन विभाग ने पिछले पांच सालों में कई बड़े तस्करी गिरोह पकड़कर रेड सैंड बोआ जब्त किए हैं। 2024 में बिहार से ही 200 से ज्यादा सांप जब्त किए गए, जिनकी अनुमानित कीमत 50-60 करोड़ रुपये थी।सांप को तस्कर सूटकेस या छोटे पैकेट में छिपाकर विदेश भेजते हैं। एक सांप की कीमत भारत में 10-25 लाख रुपये, जबकि विदेशों में 5-25 करोड़ रुपये तक जाती है।
संरक्षण और महत्व
IUCN ने रेड सैंड बोआ को ‘Near Threatened’ श्रेणी में रखा है। यह वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत अनुसूची-I में आता है, यानी इसके शिकार, बिक्री या कब्जे पर 3-7 साल की जेल और जुर्माना लग सकता है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि यह सांप इकोसिस्टम के लिए बेहद जरूरी है। यह छोटे कीट और चूहों को खाकर फसलों को नुकसान से बचाता है। इसकी कमी से चूहों की संख्या बढ़ सकती है और खेती प्रभावित हो सकती है।

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