बिहार चुनाव में NDA का कैसे बढ़ गया वोट बैंक ?

2025 Bihar Legislative Assembly election में National Democratic Alliance (एनडीए) के वोट बैंक में बढ़ोतरी के पीछे कई कारण नज़र आ रहे हैं। नीचे प्रमुख बिंदुओं में विस्तार से समझा गया है कि इस बढ़ोतरी के पीछे कौन-कौन से कारक काम कर रहे हैं, और किस तरह से बिहार की राजनीति में यह बदलाव उभरकर सामने आ रहा है।

1. विकास-एजेंडा और “दो इंजन सरकार” का भाव
एनडीए ने इस चुनाव में अपने प्रचार की धुरी बना रखी है कि उन्होंने बिहार में विकास, सुशासन और इंफ्रास्ट्रक्चर कार्यों में तेजी लाई है। पार्टी का कहना है कि पार्टी की केंद्र-राज्य + राज्य सरकार की “दो इंजन” (व नरेन्द्र मोदी-केंद्र, नितीश कुमार-राज्य) मॉडल सफल रहा है। 
–उदाहरण के लिए, एनडीए ने घोषणा की है कि पिछले वर्षों में बिहार में मुफ्त राशन, बैंक-खाता खोलना, सड़क-पानी आदि काम हुए हैं। 
–इसके चलते उन वोटरों को प्रभावित करने का प्रयास किया गया है जो “बस जात-पात नहीं, विकास चाहिए” की मानसिकता रखते हैं।
इस तरह विकास-एजेंडा ने एनडीए को पारंपरिक वोट बैंक से बाहर के वोटरों तक पहुँचने का मौका दिया है।


2. महिला वोटर और सामाजिक कल्याण योजनाओं का प्रभाव
महिला मतदाता एनडीए की रणनीति में एक बड़ा टारगेट बन गए हैं। उदाहरण के लिए:
–एक रिपोर्ट कहती है: “जहाँ महिलाएँ मतदाता संख्या में पुरुषों से अधिक थीं, वहाँ 2020 में एनडीए ने अच्छा प्रदर्शन किया था”। 
–चुनाव से पहले सीधा पैसा महिलाओं के खाते में जमा किए जाने, महिला-श्रम, बिजली मुफ्त यूनिट, पेंशन आदि की घोषणाएँ हुई हैं। 
–इस तरह महिलाओं को ध्यान में रखकर योजनाएँ चलाने से एनडीए को सामाजिक कल्याण के दृष्टिकोण से लाभ मिला है, और वोट बैंक विस्तार हुआ है।
यह बदलाव दिखाता है कि वोट बैंक सिर्फ जात-पात तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सामाजिक-लिंग आधारित रणनीतियाँ भी काम कर रही हैं।


3. जातीय समीकरण में बदलाव और पार्टी रणनीति
बिहार की राजनीति में जात-पात-ओबीसी-ईबीसी समीकरण प्रमुख है। एनडीए ने इस बार अपनी रणनीति में थोड़े समायोजन किए हैं:
–भारतीय जनता पार्टी और जनता दल (यूनाइटेड) (जदयू) ने यादव एवं मुस्लिम उम्मीदवारों की संख्या कम की है, और कुशवाहा, कोइरी, ईबीसी समूहों को प्रोत्साहन दिया है। 
–एनडीए ने परंपरागत “यादव-मुस्लिम” वोट बैंक को पूरी तरह तोड़ने का दावा नहीं किया, लेकिन उसके बजाय अन्य जातीय समूहों में पकड़ बनाने का प्रयास किया है।
–इससे यह संकेत मिल रहा है कि एनडीए ने जातीय समीकरण को नए सिरे से परिभाषित किया है — न सिर्फ ‘मुख्य ओबीसी’ या ‘यादव’ बल्कि ईबीसी, श्रम-वर्ग और बहुसंख्यक समूहों पर ध्यान दे रहा है।


4. विरोधी गठबंधन की चुनौतियाँ एवं एनडीए की अवसरग्राही स्थिति
एनडीए को बढ़त मिल रही है क्योंकि विपक्षी गठबंधन को कुछ कठिनाइयाँ झेलनी पड़ रही हैं।
– उदाहरण के लिए, विपक्ष ने विचाराधीन मुद्दों जैसे बेरोज़गारी, वोटर रॉल संशोधन आदि उठाए हैं, लेकिन एनडीए ने विकास-एजेंडा तथा कल्याण-योजनाओं से अपने वोट बैंक को मजबूत किया है। 
–चुनाव से पहले वोटर लिस्ट में विशेष सुधार (Special Intensive Revision) हुआ है, जिससे मतदाता डेमोग्राफी में बदलाव आया है — यह बदलाव भी एनडीए-अनुकूल माना जा रहा है। 
–इसके अलावा, एनडीए के पास सीट-शेयरिंग व गठबंधन स्ट्रक्चर पहले से तैयार था जो उसे चुनावी मोर्चे पर बेहतर स्थिति में रखता है। 
इन कारणों से, विपक्ष की कमजोरियों का असर पड़ा और एनडीए ने अवसर को भुना लिया।

5. बढ़ती जनसंख्या प्रवास और मतदान व्यवहार में बदलाव
बिहार में युवाओं और श्रमिकों का प्रवास एक महत्वपूर्ण बदलाव लेकर आया है।
–बड़ी संख्या में लोग बाहर राज्यों में काम के लिए जा रहे हैं, जिससे कि घर में महिला-मतदाता की भूमिका बढ़ी है। 
–इसके अतिरिक्त, चुनाव से पहले मतदाता सूची में व्यापक समायोजन हुआ है, जिससे कुछ क्षेत्रों में मतदाता-संख्या कम हुई है, और यह बदलाव राजनीतिक समीकरण को प्रभावित कर सकता है। 
–प्रवास और महिला-मुख्य परिवार की स्थिति ने एनडीए के लिए नए वोट बैंक के द्वार खोले हैं, खासकर तब जब योजनाएँ सीधे उनके खाते में गयी हैं।

इस प्रकार, 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए का वोट बैंक बढ़ने का कारण एक अकेला नहीं बल्कि कई कारकों का समन्वित परिणाम है — विकास-एजेंडा, महिला-कल्याण योजनाएँ, जातीय समीकरण में बदलाव, विरोधी गठबंधन की चुनौतियाँ, प्रवास-परिस्थितियाँ और भरोसे का संदेश। भविष्य में यह देखने योग्य होगा कि यह बढ़ोतरी कितनी स्थायी साबित होती है और उन समूहों में कितना गहरा असर करती है जिनमें अब तक एनडीए की पकड़ कम थी।

 

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