बिहार का खास लोकगीत ‘सोने के सिंघोरवा ले ले अम्मा बाड़ी खाड़ हो’, नई बहू के स्वागत में गाया जाता है ये मधुर गीत

AKANSHA UPADHYAY

बिहार की शादियां अपनी अनूठी परंपराओं, रीति-रिवाजों और लोकगीतों के लिए जानी जाती हैं। यहां शादी की हर रस्म के लिए अलग-अलग लोकगीत गाने की परंपरा रही है। हल्दी से लेकर विदाई और दुल्हन के गृह प्रवेश तक, महिलाएं पारंपरिक गीतों के जरिए हर रस्म को खास बनाती हैं। इन्हीं लोकगीतों में एक बेहद खूबसूरत गीत है ‘सोने के सिंघोरवा ले ले अम्मा बाड़ी खाड़ हो’, जिसे दुल्हन के पहली बार ससुराल पहुंचने पर उसके स्वागत के अवसर पर गाया जाता है।यह लोकगीत न केवल भोजपुरी संस्कृति की मिठास को दर्शाता है, बल्कि नई बहू के आगमन पर परिवार के सदस्यों की खुशी, उत्सुकता और स्नेह को भी बयां करता है। आइए जानते हैं इस पारंपरिक लोकगीत का अर्थ और इससे जुड़ी खास रस्म के बारे में।

नई बहू के स्वागत से जुड़ा है यह लोकगीत

पुराने समय में शादी के बाद दुल्हन डोली या पालकी में बैठकर अपने ससुराल पहुंचती थी। उस दौर में नई बहू का स्वागत भी पारंपरिक रीति-रिवाजों और लोकगीतों के साथ किया जाता था। घर की महिलाएं इस खास मौके पर गीत गाकर अपने परिवार में नई सदस्य के आने की खुशी जाहिर करती थीं।‘सोने के सिंघोरवा ले ले अम्मा बाड़ी खाड़ हो’ भी इसी परंपरा का हिस्सा है। गीत में दूल्हे की मां हाथ में सोने का सिंघोरा यानी सिंदूर रखने का पात्र लेकर खड़ी होती हैं। वह अपने बेटे से पालकी का दरवाजा खोलने के लिए कहती हैं, ताकि नई बहू की मांग में सिंदूर भरकर उसे आशीर्वाद दिया जा सके।इस दृश्य के जरिए नई बहू के स्वागत की उत्सुकता और शादी की रस्मों के प्रति परिवार की भावनाओं को बेहद सरल और भावपूर्ण अंदाज में प्रस्तुत किया गया है।

दूल्हे की बात सुनकर मां देती हैं यह जवाब

इस लोकगीत की खासियत यह है कि इसमें मां और बेटे के बीच बातचीत के अंदाज में गीत गाया जाता है। जब मां दूल्हे से पालकी का दरवाजा खोलने के लिए कहती हैं, तो दूल्हा जवाब देता है कि वह दरवाजा कैसे खोले, क्योंकि उसकी नई नवेली दुल्हन शादी की थकान के कारण गहरी नींद में सो रही है।बेटे की बात सुनने के बाद मां उसे समझाती हैं कि वह पानी की छींटें मारकर बहू को जगा दे। मां की इच्छा है कि शुभ घड़ी बीतने से पहले स्वागत की रस्म पूरी हो जाए। इस संवाद में एक मां की अपने घर आई नई बहू का स्वागत करने की अधीरता साफ झलकती है।यह प्रसंग शादी के बाद की उस खूबसूरत स्थिति को दर्शाता है, जब एक ओर दुल्हन लंबी रस्मों और थकान के बाद आराम करना चाहती है, तो दूसरी ओर ससुराल वाले उसके स्वागत के लिए उत्साहित रहते हैं।

मां के बाद भाभी भी करती हैं नई बहू के स्वागत की तैयारी

गीत में केवल दूल्हे की मां ही नहीं, बल्कि उसकी भाभी का भी जिक्र आता है। मां के बाद भाभी हाथ में सिंघोरा लेकर खड़ी होती हैं और दूल्हे से पालकी का दरवाजा खोलने के लिए कहती हैं, ताकि वह अपनी नई देवरानी की मांग में सिंदूर भरकर उसका स्वागत कर सकें।इस पर दूल्हा फिर वही बात कहता है कि उसकी दुल्हन गहरी नींद में सो रही है और वह पालकी का दरवाजा कैसे खोले। तब भाभी प्यार से उसे जगाने की बात कहती हैं, ताकि शुभ मुहूर्त निकलने से पहले रस्म पूरी हो सके।गीत का यह हिस्सा ससुराल के रिश्तों में अपनापन और प्रेम दिखाता है। इसमें सास और बहू के साथ-साथ देवरानी और जेठानी के रिश्ते की आत्मीयता भी दिखाई देती है। नई बहू को परिवार में अपनाने की खुशी इस पूरे गीत में सहज रूप से महसूस की जा सकती है।

संवाद शैली में गाया जाता है यह भोजपुरी लोकगीत

‘सोने के सिंघोरवा ले ले अम्मा बाड़ी खाड़ हो’ की सबसे खास बात इसकी संवाद शैली है। गीत में मां, बेटा और भाभी के बीच होने वाली बातचीत को लोकधुन के जरिए पेश किया जाता है। इसी वजह से इसे सुनते समय ऐसा लगता है, मानो शादी के घर का पूरा दृश्य आंखों के सामने जीवंत हो उठा हो।इसमें दूल्हे की मां और भाभी की उत्सुकता दिखाई देती है, जबकि दूल्हा अपनी दुल्हन को नींद से जगाने को लेकर संकोच जताता है। गीत के बोलों में हल्का-सा हास्य, पारिवारिक अपनापन और शुभ अवसर की गंभीरता एक साथ देखने को मिलती है।ठेठ भोजपुरी भाषा में गाया जाने वाला यह गीत अपनी स्थानीय बोली और सहज अभिव्यक्ति के कारण श्रोताओं के दिल को छू लेता है। इसकी भाषा में ऐसी आत्मीयता है, जिससे बिहार की पारंपरिक शादियों की तस्वीर उभरकर सामने आती है।

लोकगीतों में आज भी जीवित हैं बिहार की परंपराएं

आज समय के साथ शादियों का स्वरूप काफी बदल गया है। पहले जहां दुल्हन डोली या पालकी में बैठकर ससुराल पहुंचती थी, वहीं अब गाड़ियों से उसकी विदाई और आगमन होता है। शादी की रस्मों में भी कई बदलाव आए हैं, लेकिन पारंपरिक लोकगीतों का महत्व आज भी बना हुआ है।‘सोने के सिंघोरवा ले ले अम्मा बाड़ी खाड़ हो’ जैसे लोकगीत बिहार की सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का काम करते हैं। ये गीत केवल रस्मों का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि परिवार के रिश्तों, भावनाओं और लोकजीवन की कहानियां भी अपने भीतर समेटे हुए हैं।नई बहू के स्वागत में गाया जाने वाला यह गीत याद दिलाता है कि भारतीय शादियों की खूबसूरती केवल रीति-रिवाजों में नहीं, बल्कि उन भावनाओं में भी छिपी होती है, जिन्हें परिवार के लोग मिलकर व्यक्त करते हैं। यही वजह है कि पीढ़ियों से चले आ रहे ऐसे लोकगीत आज भी लोगों के दिलों में खास जगह रखते हैं।

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