पीले कपड़े, मंगल गीत और मिट्टी की पूजा... क्यों खास है UP-बिहार की शादियों में होने वाली 'मटकोड़' की रस्म?

AKANSHA UPADHYAY

भारत में शादी सिर्फ दो लोगों का मिलन नहीं, बल्कि रीति-रिवाजों, परंपराओं और पारिवारिक मान्यताओं से जुड़ा एक बड़ा उत्सव है। देश के अलग-अलग हिस्सों में विवाह से पहले और शादी के दौरान कई अनोखी रस्में निभाई जाती हैं। खासकर उत्तर प्रदेश और बिहार की शादियों में लोक परंपराओं की अपनी अलग ही खूबसूरती देखने को मिलती है।इन्हीं पारंपरिक रस्मों में से एक है 'मटकोड़'। पीले कपड़े पहने महिलाएं, मंगल गीत, पूजा की सामग्री और धरती से निकाली गई पवित्र मिट्टी—मटकोड़ की रस्म शादी के माहौल को और भी खास बना देती है। लेकिन आखिर यह रस्म क्या है और इसे इतना महत्वपूर्ण क्यों माना जाता है? आइए जानते हैं।

क्या है मटकोड़ की रस्म?

'मटकोड़' शब्द का सामान्य अर्थ है मिट्टी को खोदकर निकालना। उत्तर प्रदेश और बिहार के कई इलाकों में विवाह से पहले यह रस्म पारंपरिक तरीके से निभाई जाती है। यह रस्म कई परिवारों में दूल्हे और दुल्हन, दोनों के घरों में की जाती है।शुभ मुहूर्त देखकर परिवार की महिलाएं किसी निर्धारित स्थान पर जाती हैं। वहां विधि-विधान से धरती की पूजा की जाती है और जमीन से मिट्टी निकाली जाती है। इस मिट्टी को बेहद पवित्र माना जाता है और पूजा के बाद इसे घर लाया जाता है।लोक मान्यताओं के अनुसार, यह मिट्टी धरती माता का आशीर्वाद मानी जाती है। इसे विवाह स्थल पर लाने का उद्देश्य नवविवाहित जोड़े के जीवन में सुख-समृद्धि, स्थिरता और सकारात्मकता की कामना करना होता है।

मंगल गीतों के साथ निभाई जाती है रस्म

मटकोड़ सिर्फ पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है। यह परिवार की महिलाओं के लिए खुशी और उत्सव का भी अवसर होता है। महिलाएं मंगल गीत गाते हुए निर्धारित स्थान तक जाती हैं और पूरे उत्साह के साथ रस्म को पूरा करती हैं।परंपरा के अनुसार, शादी वाले घर की पांच सुहागिन महिलाएं इस अनुष्ठान में शामिल होती हैं। वे अपने साथ बांस की डलिया, कुल्हाड़ी, सिंदूर, अक्षत, जल, जौ, पान और अन्य शुभ सामग्री लेकर जाती हैं।कई जगहों पर इस दौरान महिलाओं के पीले कपड़े पहनने की परंपरा भी देखने को मिलती है। रस्म के दौरान पांच महिलाओं का 'खोईंछा' भी भरा जाता है, जिसे सौभाग्य और मंगलकामना से जोड़कर देखा जाता है।

बुआ या बहन निभाती हैं अहम भूमिका

मटकोड़ की रस्म में दूल्हे या दुल्हन की बुआ की भूमिका विशेष मानी जाती है। अगर बुआ मौजूद न हों, तो परिवार की बहन यह रस्म निभाती हैं।परंपरा के अनुसार, बुआ या बहन कुल्हाड़ी से जमीन पर पांच बार वार करके मिट्टी खोदती हैं। इसके बाद निकाली गई मिट्टी को बांस की डलिया में रखा जाता है। महिलाएं मंगल गीत गाते हुए इस मिट्टी को सम्मान के साथ घर लेकर आती हैं।यह पूरा दृश्य शादी के घर में उत्सव और उमंग का माहौल बना देता है।

मिट्टी से बनता है मंडप का चूल्हा

मटकोड़ से लाई गई मिट्टी को घर के आंगन में रखा जाता है। इसके बाद पंडित द्वारा पूजा कराई जाती है और कलश स्थापित किया जाता है। कई परंपराओं में इसी के बाद विवाह की दूसरी रस्में, जैसे हल्दी, शुरू होती हैं।इस रस्म की सबसे खास बात यह है कि मटकोड़ से लाई गई मिट्टी का इस्तेमाल विवाह मंडप के नीचे चूल्हा बनाने में भी किया जाता है। इस चूल्हे को बेहद शुभ माना जाता है।यानी जिस मिट्टी को धरती माता का आशीर्वाद मानकर घर लाया जाता है, वही मिट्टी विवाह के महत्वपूर्ण अनुष्ठानों का हिस्सा बन जाती है।

प्रकृति और नई शुरुआत से जुड़ी है परंपरा

मटकोड़ को सिर्फ एक पारंपरिक रस्म के तौर पर देखना इसके महत्व को सीमित कर देगा। इसके पीछे प्रकृति, धरती और जीवन के प्रति सम्मान की भावना भी जुड़ी हुई है।हिंदू परंपराओं में धरती को जीवन और उर्वरता का प्रतीक माना गया है। ऐसे में विवाह जैसे नए जीवन की शुरुआत से पहले धरती से मिट्टी लेकर उसकी पूजा करना प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का एक तरीका माना जाता है।वहीं, मिट्टी को विवाह मंडप में स्थान देना इस बात का प्रतीक भी माना जा सकता है कि नए दांपत्य जीवन की नींव प्रकृति और परिवार के आशीर्वाद के साथ रखी जा रही है।

बदलते दौर में भी कायम है परंपरा

आज शादियों का स्वरूप काफी बदल गया है। डेस्टिनेशन वेडिंग से लेकर थीम बेस्ड समारोह तक, विवाह में आधुनिकता का रंग साफ दिखाई देता है। इसके बावजूद उत्तर प्रदेश और बिहार के कई परिवारों में मटकोड़ जैसी पारंपरिक रस्में आज भी पूरे उत्साह से निभाई जाती हैं।मंगल गीतों की धुन, पीले कपड़ों में सजी महिलाएं, पूजा की सामग्री और मिट्टी को सम्मान के साथ घर लाने की परंपरा—ये सभी मिलकर शादी के उत्सव को सिर्फ धार्मिक ही नहीं, बल्कि भावनात्मक और सांस्कृतिक रूप से भी समृद्ध बनाते हैं।

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