धरती आबा बिरसा मुंडा: आदिवासी चेतना के महान नायक
BY-Ujjwal Singh
भारत के स्वतंत्रता संग्राम में कई ऐसे नायक हुए हैं जिनका योगदान इतिहास की मुख्यधारा में अपेक्षित स्थान नहीं पा सका. इन्हीं में से एक थे धरती आबा बिरसा मुंडा, जिन्होंने न केवल अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दी, बल्कि आदिवासी समाज को अपनी पहचान, अधिकार और स्वाभिमान के लिए खड़ा किया. उनके व्यक्तित्व और संघर्ष का प्रभाव इतना गहरा था कि आदिवासी समाज ने उन्हें भगवान का दर्जा दे दिया. बिरसा मुंडा का जीवन जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए दिए गए संघर्ष और बलिदान की अमर गाथा है.![]()
धरती आबा बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर 1875 को वर्तमान झारखंड के खूंटी जिले के उलिहातू गांव में हुआ. उनका उदय 1857 की क्रांति के लगभग दो दशक बाद हुआ, जब अंग्रेजी शासन आदिवासी क्षेत्रों में अपनी जड़ें मजबूत कर चुका था. बिरसा की प्रारंभिक शिक्षा चाईबासा के जर्मन मिशन स्कूल में हुई. पढ़ाई के दौरान ही उनके भीतर अन्याय के खिलाफ विद्रोह की भावना दिखाई देने लगी. उस समय आदिवासियों के बीच सरदार आंदोलन चल रहा था, जो सरकार और मिशनरियों के अत्याचारों के विरुद्ध था. इसी आंदोलन से जुड़ाव के कारण बिरसा को मिशन स्कूल से निकाल दिया गया और उनके जीवन की दिशा पूरी तरह बदल गई.
मिशन छोड़ने के बाद बिरसा ने पहले रोमन कैथोलिक धर्म अपनाया, लेकिन जल्द ही उन्हें इससे भी मोहभंग हो गया. इसके बाद वे आनंद पांड़ जैसे विद्वानों के संपर्क में आए, जो रामायण और महाभारत के ज्ञाता थे. इन धार्मिक और सामाजिक विचारों ने बिरसा के चिंतन को नई दिशा दी. धीरे-धीरे बिरसा एक आध्यात्मिक नेता के रूप में उभरे. उन्होंने एक दिन स्वयं को ‘धरती आबा’ (पृथ्वी पिता) घोषित किया. उनके अनुयायियों ने उन्हें ईश्वरीय शक्ति का अवतार मान लिया. 1895 तक वे मुंडा समाज में एक बड़े धार्मिक गुरु बन चुके थे. 
धार्मिक आंदोलन से राजनीतिक संघर्ष ,बिरसा का आंदोलन शुरू में धार्मिक सुधार तक सीमित था, लेकिन जल्द ही यह भूमि और अधिकारों से जुड़ा राजनीतिक आंदोलन बन गया. अंग्रेजी सरकार द्वारा जंगलों को आरक्षित घोषित करने और जमींदारी व्यवस्था लागू करने से आदिवासियों में भारी आक्रोश था. बिरसा ने आदिवासियों को जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए एकजुट किया. उन्होंने अंग्रेजों के शासन को समाप्त होने की घोषणा तक कर दी, जिससे सरकार सतर्क हो गई. अगस्त 1895 में उन्हें पहली बार गिरफ्तार किया गया और दो वर्ष की सजा दी गई.
अबुआ दिशुम, अबुआ राज’ का नारा..
जेल से रिहा होने के बाद बिरसा ने फिर से आंदोलन को तेज किया .उन्होंने आदिवासियों को अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने का आह्वान किया. इसी दौरान प्रसिद्ध नारा दिया गया ,अबुआ दिशुम, अबुआ राज” जिसका अर्थ है अपना देश, अपना राज. बिरसा मुंडा के आंदोलन का मुख्य लक्ष्य अंग्रेज अफसर, मिशनरी और जमींदार थे, जिन्हें वे आदिवासियों के शोषण का जिम्मेदार मानते थे. 
उलगुलान: अंग्रेजी सत्ता को खुली चुनौती
24 दिसंबर 1899 से शुरू हुआ आदिवासी विद्रोह, जिसे उलगुलान (महाविद्रोह) कहा जाता है, अंग्रेजी शासन के लिए बड़ी चुनौती बन गया. कई इलाकों में चर्च और सरकारी प्रतिष्ठानों पर हमले हुए. खूंटी, सिंहभूम और आसपास के क्षेत्रों में विद्रोह की आग फैल गई. पुलिस लगातार बिरसा की तलाश में जुटी रही. अंततः 3 फरवरी 1900 को विश्वासघात के कारण उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और रांची जेल भेज दिया गया.
जहाँ 9 जून 1900 को रांची जेल में हैजा के कारण बिरसा मुंडा का निधन हो गया. अंग्रेजी सरकार ने बिना किसी सार्वजनिक समारोह के उनका अंतिम संस्कार कर दिया, लेकिन वे लोगों के दिलों में अमर हो गए. उनकी मृत्यु के बाद भी उनका संघर्ष व्यर्थ नहीं गया. उनके आंदोलन के परिणामस्वरूप छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम जैसे कानून बने, जिसने आदिवासियों की भूमि की रक्षा की.
आपको बता दू की धरती आबा बिरसा मुंडा केवल एक स्वतंत्रता सेनानी नहीं, बल्कि आदिवासी अस्मिता, स्वाभिमान और अधिकारों के प्रतीक थे. उनका जीवन हमें सिखाता है कि संगठित चेतना और साहस से सबसे बड़ी सत्ता को भी चुनौती दी जा सकती है. आज भी बिरसा मुंडा आदिवासी समाज के लिए भगवान समान हैं और पूरे भारत के लिए एक प्रेरणादायक नायक.

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