बीजेपी स्थापना दिवस: पार्टी के लिए आडवाणी का योगदान...

लगातार दो बार केंद्र सरकार में ऐतिहासिक जीत दर्ज करने वाली भारतीय जनता पार्टी  की आज स्थापना दिवस है आज ही के दिन यानी 6 अप्रैल 1980 को भाजपा का गठन हुआ था.

जब से लेकर आज तक इन 41 वर्षों में भारतीय जनता पार्टी में बहुत से उतार-चढ़ाव है, मगर एक बार भाजपा नेताओं में देखने को बहुत ही खास मिली इन उतार-चढ़ाव और संघर्ष के बीच में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई,लालकृष्ण आडवाणी से लेकर और मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह समेत तमाम भाजपा के नेताओं ने हार नहीं मानी, उसी का परिणाम है कि आज भाजपा देश ही नहीं बल्कि दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी है.

बीजेपी स्थापना दिवस

हिंदुत्‍व और राम जन्‍मभूमि के एजेंडे पर आगे बढ़ी बीजेपी ने अपने दम पर पूर्ण बहुमत का स्‍वाद चखा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्‍व में। 2014 में बीजेपी ने 282 सीटें जीतीं तो 2019 में उसकी सीटों का आंकड़ा 300 के पार चला गया.

BJP Foundation Day, 6th April 2021: देश में आज ही के दिन हुई थी BJP की  स्थापना, इन नेताओं ने पहुंचाया शिखर तक Bharatiya janata party foundation  day 6 april today in

आडवाणी ने अपनी आत्‍मकथा 'मेरा देश, मेरा जीवन' (प्रभात प्रकाशन) में बीजेपी के अस्तित्‍व में आने पर एक पूरा चैप्‍टर लिखा है। 'कमल का खिलना, भारतीय जनता पार्टी का जन्‍म' चैप्‍टर में आडवाणी बताते हैं कि किस तरह जनसंघ के टुकड़े हुए और बीजेपी बनी

अपनी किताब में आडवाणी लिखते हैं, "एक विषय जिसने पूरे राजनीतिक जीवन में मुझे चकित किया है, वह है भारतीय मतदाता चुनावों में अपनी पसंद का निर्धारण कैसे करते हैं ? कई बार उनके रुझान का अनुमान लगाया जा सकता है, लेकिन ज्यादातर नहीं। भारतीय मतदाताओं के विशाल विविधता के चलते सामान्यत: चुनाव के परिणामों का पूर्वानुमान लगाना असंभव होता है.

हालांकि कई बार ऐसा भी होता है कि मतदाताओं का सामूहिक व्यवहार किसी एक भावना संचालित होता दिखता है और इससे उनकी पसंद का अनुमान लगाया जा सकता है। औपचारिक प्रशिक्षण प्राप्त न करने के बावजूद एक अनुभवी राजनीतिक कार्यकर्ता अक्सर यह भविष्यवाणी कर सकता है कि चुनावी हवा किस ओर बह रही है....

आडवाणी लिखते हैं, "मैंने ऐसा वर्ष 1977 के आम चुनावों से पहले किया था, जो आपातकाल के बाद हुए थे। और मैंने पुन: ऐसा ही 1980 के आरंभ में किया, जब छठी लोकसभा भंग होने के बाद मध्यावधि चुनाव हुए थे। मैं जानता था कि राजनीतिक पार्टी का सफाया हो जाएगा और इंदिरा गांधी दोबारा सत्ता में लौटेंगी.

इसका कारण साफ था। यदि आपातकाल के विरुद्ध रोष की भावना ने 1977 में जनता पार्टी को सत्ता दिलाई तो एक अन्य सामूहिक आपसी झगड़ों के कारण जनता पार्टी की सरकार गिरने से उत्पन्न हुई निराशा ने लोगों के भ्रम को तोड़ दिया और इस बार यह मतदाताओं के व्यवहार को प्रभावित करने वाला था."

 

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