काली हल्दी खेती: कैसे करें, कितनी कमाई हो सकती है

हल्दी (Turmeric) भारतीय कृषि का एक महत्वपूर्ण मसाला है। इसकी कई प्रजातियाँ हैं, जिनमें काली हल्दी (Black Turmeric) एक विशेष प्रकार की हल्दी है, जिसे औषधीय गुणों और मूल्य के लिए जाना जाता है। काली हल्दी का उपयोग औषधियों, मसालों और सुगंधित उत्पादों में किया जाता है।

काली हल्दी के लाभ

औषधीय गुण: काली हल्दी में एंटी-इंफ्लेमेटरी, एंटीऑक्सीडेंट और रोग प्रतिरोधक गुण अधिक पाए जाते हैं।
उच्च मांग: इसकी बाजार में मांग अधिक है और कीमत सामान्य हल्दी से अधिक है।
औद्योगिक उपयोग: दवा उद्योग और कॉस्मेटिक उद्योग में इसका उपयोग बढ़ रहा है।

मिट्टी और जलवायु

काली हल्दी की खेती के लिए उर्वरक और जलनिकासी वाली दोमट मिट्टी उपयुक्त होती है।
यह उष्णकटिबंधीय और आर्द्र जलवायु में अच्छी होती है।
आदर्श तापमान: 20-35°C, बारिश: 1500-2500 mm सालाना।

बीज और रोपाई

काली हल्दी की खेती आम तौर पर रायसी (rhizome) या कंद से की जाती है।
रोपाई का समय: फरवरी से अप्रैल।
पौधों की दूरी: 30-40 cm, कतार के बीच: 45-60 cm।

सिंचाई और देखभाल

हल्दी को नियमित सिंचाई की आवश्यकता होती है, खासकर शुरुआती चरण में।
बुवाई के 3-4 महीनों के बाद, हल्दी के पौधे को खरपतवार नियंत्रण और सुपरफॉस्फेट जैसी जैविक उर्वरक की जरूरत होती है।

7-8 महीनों में काली हल्दी का पौधा तैयार हो जाता है।

कटाई और भंडारण

काली हल्दी की कटाई आमतौर पर 9-10 महीने के बाद होती है, जब पौधा पीला होने लगे।
कटाई के बाद हल्दी को धूप में सुखाया जाता है और फिर मार्केट या भंडारण के लिए तैयार किया जाता है।

बाजार और लाभ

काली हल्दी का मूल्य नियमित हल्दी से अधिक होता है।
औषधीय और जड़ी-बूटी उद्योग इसे अधिक मांगते हैं।
यदि सही तरीके से खेती और प्रबंधन किया जाए तो प्रति हेक्टेयर अच्छा लाभ प्राप्त किया जा सकता है।

काली हल्दी की खेती एक लाभकारी और कम जोखिम वाली कृषि गतिविधि है, बशर्ते सही मिट्टी, जलवायु और कृषि तकनीक का पालन किया जाए। यह न केवल किसानों के लिए आय का स्रोत बन सकती है, बल्कि औषधीय उद्योग की मांग को भी पूरा करती है।

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