ब्रजेश पाठक ने मंच से बताया सुनील भराला का सियासी कद, विरासत में मिले संस्कार, संघर्ष से बनाई अपनी पहचान

गाजियाबाद  उत्तर प्रदेश की राजनीति में पश्चिमी यूपी का अपना खास महत्व है। ऐसे में डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक का पूर्व राज्यमंत्री सुनील भराला को लेकर दिया गया बयान राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है। गाजियाबाद के पंडित दीनदयाल उपाध्याय ऑडिटोरियम में आयोजित अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा के कार्यक्रम में पहुंचे ब्रजेश पाठक ने मंच से सुनील भराला की जमकर तारीफ की।

ब्रजेश पाठक ने कहा कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश ही नहीं, देश में कहीं भी ब्राह्मण समाज की बात आती है तो सुनील भराला का नाम सबसे पहले आता है। डिप्टी सीएम के इस बयान को केवल मंचीय प्रशंसा के तौर पर नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसके राजनीतिक मायने भी निकाले जा रहे हैं।

परिवार से मिले राजनीतिक संस्कार

सुनील भराला को राजनीति के संस्कार परिवार से मिले। उनके पिता पंडित मलखान सिंह भारद्वाज लोकतंत्र सेनानी रहे। वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में प्रचारक और विस्तारक के रूप में सक्रिय रहे और भारतीय जनसंघ के दौर से राजनीति से जुड़े रहे।

वर्ष 1974 में उन्होंने जनसंघ के टिकट पर चुनाव भी लड़ा था। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ भी उनके करीबी राजनीतिक संबंध बताए जाते हैं।

हालांकि, राजनीतिक विरासत मिलने के बावजूद सुनील भराला ने अपनी अलग पहचान खुद बनाई। छात्र राजनीति से लेकर संगठन और सामाजिक आंदोलनों तक उनकी सक्रियता ने पश्चिमी यूपी में उनके राजनीतिक आधार को मजबूत किया।

छात्र राजनीति से शुरू हुआ सियासी सफर

सुनील भराला ने राजनीति की शुरुआत किसी बड़े राजनीतिक पद से नहीं की। 90 के दशक से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में संगठनात्मक गतिविधियों और जमीनी आंदोलनों के जरिए उन्होंने अपनी पहचान बनानी शुरू की।

कार्यकर्ताओं के बीच लगातार मौजूदगी, सामाजिक मुद्दों को लेकर सक्रियता और संगठन के कार्यक्रमों में भागीदारी उनकी राजनीतिक शैली का हिस्सा रही। समय के साथ उनका प्रभाव मेरठ और पश्चिमी उत्तर प्रदेश से आगे बढ़कर प्रदेश स्तर तक पहुंचा।

उनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि भी राजनीति से जुड़ी रही है। उन्होंने राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर की पढ़ाई करने के साथ कानून की शिक्षा भी हासिल की।

योगी सरकार में मिला राज्यमंत्री का दर्जा

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार के दौरान सुनील भराला को उत्तर प्रदेश श्रम कल्याण परिषद का अध्यक्ष बनाया गया और उन्हें राज्यमंत्री का दर्जा मिला।

सरकारी जिम्मेदारी मिलने के बाद भी उनकी संगठनात्मक और सामाजिक सक्रियता जारी रही। इसके साथ ही राष्ट्रीय परशुराम परिषद के माध्यम से उन्होंने ब्राह्मण समाज के बीच अपनी सक्रियता और संगठनात्मक नेटवर्क को और विस्तार दिया।

यही वजह है कि उनकी राजनीतिक पहचान केवल किसी सरकारी पद तक सीमित नहीं रही।

ब्राह्मण समाज के साथ व्यापक सामाजिक संपर्क

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में सामाजिक समीकरणों की अहम भूमिका रही है। सुनील भराला की सक्रियता भी केवल ब्राह्मण समाज तक सीमित नहीं मानी जाती। मेरठ और आसपास के इलाकों में त्यागी समाज समेत विभिन्न सामाजिक वर्गों के बीच उनका संपर्क और राजनीतिक नेटवर्क उनकी ताकत माना जाता रहा है।

छात्र राजनीति, सामाजिक आंदोलनों और संगठनात्मक गतिविधियों से होते हुए उन्होंने कार्यकर्ताओं के बीच अपनी अलग जगह बनाई।

ब्रजेश पाठक के बयान के क्या हैं सियासी मायने?

उत्तर प्रदेश की राजनीति अब 2027 विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ रही है। ऐसे समय में सामाजिक समीकरणों को लेकर सभी राजनीतिक दल अपनी रणनीति मजबूत करने में जुटे हैं।

ऐसे माहौल में डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक का सार्वजनिक मंच से सुनील भराला के राजनीतिक कद की तारीफ करना चर्चा का विषय बनना स्वाभाविक है।

ब्रजेश पाठक का यह कहना कि पश्चिमी यूपी ही नहीं, देश में कहीं भी ब्राह्मण समाज की बात आती है तो सुनील भराला का नाम सबसे पहले आता है, उनकी लंबे समय से चली आ रही सामाजिक और राजनीतिक सक्रियता की बड़ी सार्वजनिक स्वीकार्यता के तौर पर देखा जा रहा है।

विरासत से मिले संस्कार, संघर्ष से बनाई पहचान

सुनील भराला की राजनीतिक यात्रा को देखें तो उन्हें पिता मलखान सिंह भारद्वाज से राजनीतिक संस्कार और विचारधारा की विरासत जरूर मिली, लेकिन छात्र राजनीति से लेकर संगठनात्मक गतिविधियों, आंदोलनों और सामाजिक संपर्क के जरिए उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई।

राज्यमंत्री का दर्जा मिलने के बाद भी जमीनी राजनीति से उनका जुड़ाव बना रहा। अब ब्रजेश पाठक के बयान ने एक बार फिर सुनील भराला के राजनीतिक कद और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में उनकी संभावित भूमिका को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

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