पूर्वांचल की राजनीति में बड़ा धमाका! बृजेश सिंह ने किया चुनाव लड़ने का ऐलान
उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में अभी वक्त है, लेकिन पूर्वांचल की सियासी तपिश इस कदर बढ़ गई है कि बड़े-बड़े सूरमाओं के पसीने छूटने लगे हैं। कभी अंडरवर्ल्ड के बेताज बादशाह, ठेकेदारी सिंडिकेट के बेधड़क सिपहसालार और खूंखार गैंगवार की पहचान रहे बाहुबली बृजेश सिंह ने वो ऐलान कर दिया है जिसने लखनऊ से लेकर दिल्ली तक खलबली मचा दी है। जी हां तस्वीर बिल्कुल फिल्मी थी, जगह थी बनारस का ऐतिहासिक अस्सी घाट और दुकान थी मशहूर 'पप्पू की चाय'। बनारसी अंदाज में चाय की चुस्कियां लेते हुए पूर्व MLC बृजेश सिंह ने सीधे मीडिया के कैमरों के सामने दहाड़ते हुए कह दिया कि "हां, मैं विधानसभा चुनाव सीधे मैदान में उतरकर लड़ूंगा और कहां से लड़ूंगा, इसकी जानकारी भी बहुत जल्द मिल जाएगी!" पर्दे के पीछे रहकर सरकारें और विधायक बनाने वाले बृजेश सिंह ने पहली बार खुलेआम जनता के बीच आकर कसम खाई। बस फिर क्या था, इस एक बयान ने गाजीपुर से लेकर मऊ, जौनपुर, वाराणसी और चंदौली तक के सियासी समीकरणों को तहस-नहस कर दिया है!
आपको बता दें ऐसा नहीं है कि बृजेश सिंह का परिवार राजनीति में नया है। बृजेश सिंह और उनके परिवार का वाराणसी और उसके आस-पास की सीटों पर दशकों से सिक्का चलता आया है। पहले उनके बड़े भाई चुलबुल सिंह और फिर खुद बृजेश सिंह निर्दलीय MLC बनकर सदन पहुंचे। मौजूदा समय में उनकी पत्नी अन्नपूर्णा सिंह वाराणसी सीट से निर्दलीय MLC हैं। उनके भतीजे सुशील सिंह चंदौली की सैयदराजा सीट से बीजेपी के कद्दावर विधायक हैं। लेकिन ट्विस्ट ये है कि आज तक बीजेपी या कोई भी बड़ी पार्टी बृजेश सिंह को सीधे टिकट देने से बचती रही है, ताकि माफिया का ठप्पा न लगे। बृजेश सिंह हमेशा निर्दलीय ही बाजी मारते रहे और पार्टियां पर्दे के पीछे से उन्हें मौन समर्थन देती रहीं। लेकिन अब पहली बार खुद डॉन सीधे विधानसभा के चुनावी समर में उतरने जा रहा है, जिससे विपक्षी दलों के होश उड़ गए हैं। हालांकि बृजेश सिंह ने यह तो साफ नहीं किया कि वो किस पार्टी से लड़ेंगे, लेकिन अस्सी घाट पर उनके मुंह से निकले राष्ट्रवाद और धर्म की रक्षा जैसे भारी-भरकम शब्दों ने साफ इशारा कर दिया है कि उनका झुकाव किधर है। सियासी पंडितों का मानना है कि बृजेश सिंह सीधे बीजेपी के सिंबल पर उतरने के बजाय NDA के किसी सहयोगी दल जैसे सुभासपा या अपना दल के टिकट पर दांव खेल सकते हैं। सीट की बात करें तो वो चंदौली, वाराणसी या जौनपुर की किसी हॉट सीट से ताल ठोक सकते हैं।
आपको बता दें पिछले तीन दशकों से पूर्वांचल की राजनीति मुख्तार अंसारी बनाम बृजेश सिंह के खूनी और सियासी गैंगवार के इर्द-गिर्द ही घूमती रही है। अब मुख्तार अंसारी के दुनिया से जाने के बाद उनके परिवार का दबदबा सिर्फ गाजीपुर और मऊ तक सिमट कर रह गया है। मुख्तार के जाने से पूर्वांचल की बाहुबली राजनीति में जो खाली जगह बनी थी, बृजेश सिंह खुद मैदान में आकर उसे पूरी तरह अपने पाले में भुनाना चाहते हैं। ठाकुर लॉबी को एक बड़ा और ताकतवर राजनीतिक चेहरा देकर वे पूरे बेल्ट के सवर्णों को गोलबंद करने की फिराक में हैं। दरअसल, 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने अपने PDA फॉर्मूले के दम पर गैर-यादव ओबीसी और दलितों को जोड़कर पूर्वांचल में बीजेपी को गहरी शिकस्त दी थी। लेकिन बृजेश सिंह की एंट्री से अखिलेश का यह चक्रव्यूह पूरी तरह टूट सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि बनारस और गाजीपुर में राजपूत, भूमिहार और ब्राह्मण वोटों का समीकरण बेहद निर्णायक है। बृजेश सिंह को सवर्ण जातियों, खासकर युवाओं का जबरदस्त समर्थन हासिल है। उनके आने से सवर्ण वोट एकमुश्त NDA के खाते में जा सकते हैं। वहीं चुनावी राजनीति में बाहुबलियों का अपना एक खतरनाक मैनेजमेंट होता है। स्थानीय ठेकेदारी, ब्लॉक प्रमुखी और जिला पंचायत स्तर पर बृजेश सिंह का जो तगड़ा नेटवर्क है, उसके सक्रिय होते ही विपक्षी कार्यकर्ताओं का मनोबल टूट सकता है।
तो कुल मिलाकर कहानी ये है कि पूर्वांचल की जनता ने हमेशा से ही बाहुबलियों को पलकों पर बिठाकर संसद और विधानसभा का रास्ता दिखाया है। चाहे वो मुख्तार अंसारी रहे हों, धनंजय सिंह या फिर हरि शंकर तिवारी। लेकिन आज की तारीख में यूपी में कानून का इकबाल और सियासत का मिजाज दोनों बदल चुके हैं। ऐसे में बृजेश सिंह का यह सीधा दांव उन्हें विधायक की कुर्सी तक पहुंचा पाता है या फिर विपक्ष उनके खूनी अतीत के पन्नों को पलटकर, जनता के बीच मुद्दा बनाकर इस दांव को फेल कर देता है, यह देखना बेहद रोमांचक होगा। पूर्वांचल के इस महा-दंगल की शुरुआत अस्सी घाट की चाय से हो चुकी है, अब देखना है कि 2027 के चुनाव में यह चाय विरोधियों के लिए कितनी कड़वी साबित होती है!
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