चीन की सुस्ती से मिर्च निर्यात में भारी गिरावट, फिर भी दाम बरकरार
भारत से मिर्च का सबसे बड़ा खरीदार रहने वाला चीन इस साल लगभग बाजार से दूर नजर आ रहा है। जहां पिछले साल 31 मार्च तक करीब 9,000 कंटेनर मिर्च चीन को भेजी गई थी, वहीं इस साल यह आंकड़ा घटकर करीब 2,000 कंटेनर पर सिमट गया है। खास बात यह है कि पिछले तीन महीनों में चीन की खरीद बेहद कम हो गई है, जिससे निर्यात में बड़ी गिरावट देखी जा रही है।
हालांकि, चीन की इस सुस्ती का भारतीय बाजार पर ज्यादा असर नहीं पड़ा है। इसकी वजह घरेलू मांग का मजबूत बने रहना है। देश के अंदर मसाला कंपनियां और खासकर उत्तर भारत के व्यापारी लगातार बड़ी मात्रा में मिर्च खरीद रहे हैं, जिससे कीमतों को सहारा मिला हुआ है।
इस साल मिर्च के उत्पादन में भी कमी आई है। अलग-अलग अनुमानों के अनुसार फसल करीब 20 से 35 प्रतिशत तक कम हुई है। उत्पादन घटने का सीधा असर कीमतों पर पड़ा है। तेजा, 334 और 341 जैसी सामान्य किस्मों की कीमतें बढ़कर लगभग 200 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई हैं, जो पिछले साल के मुकाबले करीब दोगुनी हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि चीन की कम खरीद की एक बड़ी वजह उसका पहले से किया गया स्टॉक है। पिछले साल जब कीमतें 100-110 रुपये प्रति किलो थीं, तब चीन ने भारी मात्रा में मिर्च खरीदकर भंडारण कर लिया था। इसी कारण इस साल वह सीमित खरीदारी कर रहा है।
दूसरे अंतरराष्ट्रीय बाजारों की बात करें तो अमेरिका, यूरोप और थाईलैंड से भी फिलहाल मांग कमजोर बनी हुई है। हालांकि बांग्लादेश, श्रीलंका और मलेशिया जैसे देश अभी भी भारतीय मिर्च खरीद रहे हैं। उम्मीद जताई जा रही है कि जून के बाद वैश्विक मांग में सुधार हो सकता है, जिससे कीमतों में और तेजी आ सकती है।
खास तौर पर अधिक रंग वाली मिर्च, जैसे ब्याडगी किस्म, इस साल काफी महंगी हो गई है। उत्पादन में लगभग 40 प्रतिशत की गिरावट के कारण इसकी कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। ब्याडगी डब्बी की कीमत करीब 62,000 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गई है, जबकि KDL किस्म भी लगभग 55,000 रुपये प्रति क्विंटल बिक रही है, जो पिछले साल से काफी ज्यादा है।
मिर्च के उत्पादन में गिरावट की एक बड़ी वजह फसल क्षेत्र में कमी भी है। 2025-26 सीजन में कई किसानों ने मिर्च की जगह मक्का, कपास और दलहन जैसी फसलें उगाना ज्यादा फायदेमंद समझा, जिससे मिर्च की खेती का रकबा घट गया और कुल उत्पादन कम रहने का अनुमान है।

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