जब श्री राधारमण लाल जू अपनी प्रिय मुस्कान सँभाल कर रखते हैं…
वृन्दावन में आने वाला प्रत्येक भक्त यही चाहता है कि उसे श्री राधारमण लाल का एक ऐसा दर्शन मिले, जो जीवन भर हृदय में अंकित हो जाए। कभी उनकी चितवन मन मोह लेती है, कभी अधरों की मधुर मुस्कान, तो कभी उनकी अलौकिक छवि। परन्तु कुछ क्षण ऐसे भी होते हैं, जब ऐसा प्रतीत होता है मानो स्वयं ठाकुरजी किसी विशेष आगंतुक की प्रतीक्षा कर रहे हों।
कहा जाता है कि प्रेम में प्रतीक्षा भी होती है और पहचान भी। ऐसा ही अनुभव तब होता है, जब आचार्य श्री अपने कैमरे के साथ श्रीजी के सम्मुख पहुँचते हैं। ऐसा लगता है मानो राधारमण लाल कह रहे हों—"लो, अब आ गए हमारे अपने। अब अपनी सबसे मनमोहक मुस्कान दे दें।"

उनकी वह मुस्कान कोई साधारण मुस्कान नहीं होती। वह भक्तों के लिए कृपा का संदेश होती है। कैमरे की हर क्लिक के साथ ऐसा लगता है जैसे ठाकुरजी स्वयं अपने भक्तों को निहार रहे हों। कभी सामने से, कभी तिरछी दृष्टि से, कभी चरणों का सौन्दर्य, कभी मुकुट की छटा, तो कभी अधरों पर खिली दिव्य मुस्कान—हर कोण से दर्शन कराकर आचार्य श्री उन क्षणों को अमर कर देते हैं।
जो भक्त दूर हैं, वे इन्हीं चित्रों के माध्यम से अपने आराध्य के निकट पहुँचते हैं। एक-एक तस्वीर केवल चित्र नहीं होती, वह दर्शन होती है, अनुभूति होती है और श्रीजी की कृपा का सजीव प्रमाण होती है।
कभी-कभी ऐसा लगता है कि राधारमण लाल अपनी सबसे प्यारी मुस्कान उसी क्षण के लिए सँभाल कर रखते हैं, जब उनके प्रिय छायाकार आचार्य श्री उनके सम्मुख उपस्थित हों। क्योंकि वे जानते हैं कि यह मुस्कान केवल कैमरे में कैद नहीं होगी, बल्कि लाखों भक्तों के हृदय तक पहुँचेगी और उन्हें भी उसी आनंद का अनुभव कराएगी, जो उस क्षण मंदिर में उपस्थित भक्तों को प्राप्त हुआ।
धन्य हैं वे आचार्य श्री, जिन्हें केवल सेवा ही नहीं, बल्कि अपने आराध्य की इन अलौकिक मुस्कानों को संसार तक पहुँचाने का सौभाग्य मिला है। और धन्य हैं हम, जो उन दिव्य झलकियों के माध्यम से प्रतिदिन श्री राधारमण लाल की मधुर मुस्कान का अमृतरस प्राप्त कर पाते हैं।
आख़िर कैमरा तो बस माध्यम है, वास्तव में लाल जू की मुस्कान से कैद तो भक्त का हृदय हो जाता है।
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