जाति से 'वोट टेम्प्रेचर' नापेगी बीजेपी!

सियासत में वक्त और वार का सही चुनाव ही सबसे बड़ा हथियार होता है — और मोदी सरकार ने कल वो हथियार चला दिया जो विपक्ष के हाथ में तलवार था, लेकिन चलाया प्रधानमंत्री मोदी ने और ले लिया जाति आधारित जनगणना का ऐतिहासिक फैसला! जी हां , इसे कहते हैं चाणक्य नीति....विपक्ष सोच रहा था कि जाति जनगणना का मुद्दा उनका‘ब्रह्मास्त्र’है. लेकिन अब वही मुद्दा मोदी सरकार की मुहर के साथ सामने है, और विपक्ष हक्का-बक्का है.....अब जिसे बोलना चाहिए था, वो बुदबुदा रहा है; जिसे चुप रहना था, वो श्रेय मांग रहा है..समाजवादी पार्टी कहती है ये PDA की जीत है, कांग्रेस कहती है हमने दबाव डाला, JDU और TDP अपना राग अलाप रहे हैं .. लेकिन असल में, मोदी सरकार ने विपक्ष के सबसे बड़े चुनावी मुद्दे को ही हथिया लिया और उसे अपने नाम कर दिया..लेकिन अफसोस की बात ये है कि पहलगाम में हुए हमले से ठीक बाद ऐसा हुआ ... जब विपक्ष सरकार को कोस रहा था...तब सरकार ने ऐसा तीर चलाया कि अब विपक्ष पहलगाम हमले को भूल इसी में फंस गया .. सरकार ने ये प्लान क्या सोचकर बनाया , ये समझ के बाहर है ... 

जाति जनगणना को लेकर विपक्ष की रणनीति सालों से तय थी — इसे हथियार बनाकर पिछड़ों, अति पिछड़ों और दलितों के नाम पर सत्ता तक की सीढ़ियां चढ़नी थीं। लेकिन जैसे ही सरकार ने इस पर मुहर लगाई, विपक्ष खुद उलझ गया। कांग्रेस से लेकर समाजवादी पार्टी, RJD और JDU तक — सब एक-दूसरे से क्रेडिट छीनने में लग गए...इतना ही नहीं , राहुल गांधी उसी वक्त पहलगाम हमले में मारे गए शुभम द्विवेदी के घर थे — वही युवक जिसे आतंकियों ने धर्म पूछकर मारा। राहुल वहां सांत्वना दे रहे थे, संवेदनाओं की सियासत कर रहे थे, जबकि दिल्ली में मोदी सरकार जाति की नई लकीर खींच रही थी।

और अब राहुल गांधी के सामने धर्म बनाम जाति की सियासत है.... ब्राह्मणों को साधें तो बहुजन छूटते हैं, OBC की लड़ाई लड़ें तो ब्राह्मणों से दूरी बनानी पड़ेगी...बीजेपी ने राहुल को दोधारी तलवार पर खड़ा कर दिया है — और वो खुद तय नहीं कर पा रहे, वार करें या पीछे हटें।1931 के बाद पहली बार केंद्र सरकार ने जातियों की गणना का दरवाजा खोला है। ये कदम सिर्फ एक जनगणना नहीं, भारत की सामाजिक DNA को दोबारा स्कैन करने की प्रक्रिया है। इससे उच्च जातियों को उनकी वास्तविक संख्या का एहसास होगा और बहुजन समाज, जो सालों से हिस्सेदारी की लड़ाई लड़ रहा है, अपनी ताकत आंकड़ों में देखेगा।और यही आंकड़े तय करेंगे कि संसद, विधानसभाएं, नौकरशाही और नीतियां किसके लिए और किसके दम पर बनाई जाएंगी।

सरकार को पता है कि यह फैसला 2024 की नहीं, 2029 और उससे आगे की राजनीति को तय करेगा। मोदी सरकार ने साफ संकेत दे दिया है — वो केवल हिंदुत्व की लहर नहीं, जातीय सोशल इंजीनियरिंग की सुनामी भी तैयार कर रही है।

जहां विपक्ष नारा गढ़ रहा था, सरकार ने नीति बना दी।
जहां विपक्ष नफरत गिन रहा था, सरकार संख्या गिनने लगी।

जाति गणना का यह फैसला ब्राह्मणों को चुप और बहुजन समाज को मुखर करेगा... पिछड़े अब आंकड़ों के साथ सवाल पूछेंगे — कि अगर हम 50% से अधिक हैं तो शासन में हमारी भागीदारी क्यों नहीं? 

देखा जाए तो यह जनगणना नहीं, सत्ता की नई स्क्रिप्ट है — और इसे मोदी ने विपक्ष के सबसे बड़े एजेंडे पर लिख डाला है..एक तरफ कश्मीर की घाटी में बहता खून था, दूसरी तरफ दिल्ली की गलियों में बहती गिनती। पहलगाम में एक ब्राह्मण की हत्या पर कुछ वक्त तक देश थमा जरूर, मगर जाति गणना की खबर ने सबको अपनी-अपनी जाति के आंकड़ों में उलझा ही  दिया है ... अब न बहस आतंकवाद पर हो रही है, न सवाल सुरक्षा पर। अब देश की राजनीति की धुरी बदल चुकी है — हर दल, हर नेता, हर जाति अब इस बात पर टिकी है कि ‘गिनती में हम कहां हैं?’मोदी सरकार ने ऐसा दांव चला है जिसने हर बहस की दिशा बदल दी है। पहलगाम की चीखें दब गई हैं और संसद से सड़क तक सिर्फ एक ही शोर है — ‘जाति कितनी, हिस्सा कितना।’कहा जा सकता है कि अब राजनीति भावनाओं से नहीं, गणनाओं से चलेगी ..

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