‎गढ़चांदूर में पुलिस की चुप्पी पर उठे सवाल, स्कूल-कॉलेज के पास कथित अवैध कारोबार का आरोप

 चंद्रपुर : ‎महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले के गढ़चांदूर से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ‎एक तरफ स्थानीय नेता द्वारा दावा किया जा रहा है कि क्षेत्र में कथित सट्टा-मटका और झंडी-मुंडी के कारोबार को लेकर 112 नंबर पर बार-बार पुलिस को सूचना दी गई, लेकिन दूसरी तरफ आरोप है कि इसके बावजूद मौके पर प्रभावी कार्रवाई नजर नहीं आई।

‎‎अब सवाल सीधा है—

‎अगर पुलिस को बार-बार सूचना दी गई, तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
‎‎क्या पुलिस को इस कथित कारोबार की जानकारी नहीं है?
‎‎या फिर जानकारी होने के बावजूद कार्रवाई नहीं हो रही?
‎‎और अगर शिकायत गलत है, तो पुलिस जांच कर इसकी सच्चाई जनता के सामने क्यों नहीं रखती?
‎‎मामला गढ़चांदूर के बस स्टैंड के पास, सावित्रीबाई फुले कनिष्ठ महाविद्यालय के नजदीक स्थित अशोका वाचनालय के आसपास का बताया जा रहा है।
‎शिकायत और स्थानीय स्तर पर लगाए जा रहे आरोपों के मुताबिक, यहां अरविंद गोरे और रतन खत्री नाम के व्यक्तियों द्वारा कथित तौर पर झंडी-मुंडी और सट्टा-मटका का कारोबार चलाए जाने की बात सामने आई है।
‎‎हम इन आरोपों को सही या गलत नहीं ठहरा रहे हैं।
‎‎लेकिन सवाल यह है कि अगर ऐसी शिकायत पुलिस प्रशासन तक पहुंच रही है, तो उसकी निष्पक्ष जांच क्यों नहीं होनी चाहिए?
‎‎सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि स्थानीय नेता की ओर से दावा किया जा रहा है कि उन्होंने इस कथित गतिविधि को लेकर बार-बार 112 नंबर पर पुलिस को सूचना दी।
‎‎यानी अगर यह दावा सही है, तो पुलिस के पास शिकायत पहुंचने की बात सामने आती है।
‎‎अब जनता जानना चाहती है—
‎‎112 पर फोन हुआ या नहीं?
‎‎अगर हुआ तो पुलिस की ओर से क्या रिस्पॉन्स दिया गया?
‎‎क्या पुलिसकर्मी मौके पर पहुंचे?
‎अगर पहुंचे तो क्या जांच की गई?
‎‎अगर जांच की गई तो क्या मिला?
‎‎और अगर कथित तौर पर अवैध गतिविधि नहीं मिली, तो इसकी जानकारी शिकायतकर्ता को दी गई या नहीं?
‎‎इन तमाम सवालों का जवाब अब पुलिस प्रशासन को देना चाहिए।
‎‎असली सवाल—कथित कारोबार खुलेआम है तो कार्रवाई कौन करेगा?
‎‎स्थानीय लोगों की शिकायतों में यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि अगर यह कथित कारोबार वास्तव में चल रहा है, तो क्या संबंधित विभाग को इसकी भनक तक नहीं है?
‎‎क्योंकि जिस जगह का जिक्र शिकायत में किया गया है, वह कोई सुनसान इलाका नहीं बताया जा रहा।
‎‎बताया जा रहा है कि यह इलाका बस स्टैंड और शैक्षणिक संस्थान के आसपास है।
‎ऐसे में सवाल और गंभीर हो जाता है।
‎‎अगर पुलिस की नजर के सामने कोई गैरकानूनी गतिविधि चल रही हो, तो जिम्मेदारी किसकी है?
‎‎और अगर पुलिस को इसकी जानकारी नहीं है, तो फिर पुलिस की स्थानीय निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
‎‎वाचनालय के पास सट्टे का आरोप—विद्यार्थियों पर क्या असर?
‎‎अब जरा उस पहलू पर भी गौर कीजिए, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
‎‎बताया जा रहा है कि इसी क्षेत्र में अशोका वाचनालय है, जहां रोजाना बड़ी संख्या में विद्यार्थी पढ़ने आते हैं।
‎‎एक तरफ किताबें हैं...
‎‎एक तरफ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवा हैं...
‎‎और दूसरी तरफ अगर शिकायत के मुताबिक कथित सट्टा-मटका या झंडी-मुंडी जैसी गतिविधियां आसपास चल रही हैं, तो यह निश्चित तौर पर चिंता का विषय है।
सवाल है—
‎‎इन विद्यार्थियों को किताबों का गणित पढ़ना है या सट्टा-मटके का गणित?
‎‎माता-पिता अपने बच्चों को पढ़ने के लिए भेजते हैं।
‎‎वे चाहते हैं कि बच्चे शिक्षा हासिल करें, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करें और अपने भविष्य को बेहतर बनाएं।
‎‎ऐसे में शैक्षणिक माहौल के आसपास किसी भी तरह की कथित गैरकानूनी गतिविधि की शिकायत को प्रशासन को गंभीरता से लेना चाहिए।
‎‎पुलिस प्रशासन से सीधे सवाल
‎‎अब सवाल गढ़चांदूर पुलिस और संबंधित प्रशासन से—
‎सवाल नंबर 1:
‎क्या इस मामले को लेकर 112 पर शिकायत या सूचना दी गई?
‎‎सवाल नंबर 2:
‎अगर सूचना दी गई, तो पुलिस ने मौके पर जाकर क्या जांच की?
‎सवाल नंबर 3:
‎क्या कथित सट्टा-मटका और झंडी-मुंडी के कारोबार को लेकर कोई कार्रवाई की गई?
‎‎सवाल नंबर 4:
‎अगर कार्रवाई नहीं की गई, तो उसकी वजह क्या है?
‎‎सवाल नंबर 5:
‎क्या पुलिस प्रशासन इस पूरे मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच करेगा?
‎‎और सबसे बड़ा सवाल—
‎‎अगर आरोप गलत हैं तो पुलिस जांच करके सच जनता के सामने क्यों नहीं रखती? और अगर आरोप सही हैं, तो कार्रवाई कब होगी?
‎‎मीठे संबंधों का आरोप—सच क्या है?
‎‎स्थानीय स्तर पर इस मामले को लेकर तरह-तरह के सवाल और चर्चाएं भी सामने आ रही हैं।
‎‎कुछ लोग सवाल उठा रहे हैं कि आखिर कथित कारोबारियों को इतनी बेखौफ होकर काम करने की हिम्मत कहां से मिल रही है? ‎
‎क्या वास्तव में किसी प्रभावशाली व्यक्ति का संरक्षण है?
‎‎क्या पुलिस और कथित कारोबारियों के बीच कोई सांठगांठ है?
‎‎या फिर ये सिर्फ आरोप और अफवाहें हैं?
‎‎इसका फैसला हम या कोई व्यक्ति नहीं कर सकता।
‎‎इसका जवाब निष्पक्ष पुलिस जांच से ही सामने आ सकता है।
‎‎इसलिए जरूरी है कि पुलिस प्रशासन खुद आगे आए, जांच करे और अगर आरोप निराधार हैं तो स्थिति साफ करे।‎
‎और अगर शिकायत में दम है, तो कानून के मुताबिक कार्रवाई करे।
‎‎गढ़चांदूर की जनता अब सिर्फ सवाल नहीं पूछ रही...
‎‎जवाब मांग रही है।
‎‎112 पर शिकायत हुई या नहीं?
‎‎पुलिस मौके पर गई या नहीं?
‎‎जांच हुई या नहीं?
‎अगर हुई तो कार्रवाई क्यों नहीं?
‎‎और अगर कार्रवाई की जरूरत नहीं थी, तो उसकी वजह क्या थी?
‎क्योंकि मामला सिर्फ एक कथित सट्टा-मटका कारोबार का नहीं है...
‎‎मामला कानून-व्यवस्था और पुलिस प्रशासन पर जनता के भरोसे का है।
‎‎शिकायतकर्ता नेता का दावा है कि उन्होंने बार-बार पुलिस को सूचना दी।
‎‎अब गेंद पूरी तरह पुलिस प्रशासन के पाले में है।
‎‎क्या गढ़चांदूर पुलिस इन आरोपों की निष्पक्ष जांच कर सच्चाई सामने लाएगी?
‎‎क्या कथित सट्टा-मटका और झंडी-मुंडी के कारोबार पर कानून के मुताबिक कार्रवाई होगी?
‎‎या फिर शिकायतें आती रहेंगी...
‎**112 की घंटी बजती रहेगी...
‎‎और कथित अवैध कारोबार यूं ही चलता रहेगा?**
‎‎फिलहाल इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है और संबंधित लोगों का पक्ष भी सामने आना बाकी है। पुलिस जांच के बाद ही पूरी सच्चाई स्पष्ट होगी।

रिपोर्टर : अजय

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