खुले आसमान में कांपता वृद्ध दंपत्ति, सुतली की बोरी में सिमटी जिंदगी

लावालोंग : प्रखण्ड में आज भी विकास के नाम से मुँह चिढ़ाती नजर आ रही है. सरकारी योजनाओं की जमीनी हकीकत को आईना दिखाती एक मार्मिक तस्वीर लावालौंग प्रखंड के बरहेद गांव से सामने आई है। 80 वर्ष से अधिक उम्र पार कर  वृद्ध दंपत्ति दुलारचंद गंझू और उनकी पत्नी बतिया देवी खुले आसमान के नीचे झोपड़ी बनाकर सुतली की बोरी ओढ़कर तथा लकड़ी को जलाकर पूस की कड़ाके की ठंड काटने को मजबूर हैं। घने कोहरे और शीतलहर के बीच यह बुजुर्ग दंपत्ति हर रात ठंड से जूझ रहा है। इनके पास न सही से रहने को पक्का आवास है, न गर्म कपड़े, वृद्धावस्था में पेंशन नही किसी अन्य सरकारी जनकल्याणकारी योजना का लाभ नहीं। जीवन के इस पड़ाव पर, जब सहारे की सबसे अधिक जरूरत होती है, तब यह दंपत्ति प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार नजर आता है। दुलारचंद गंझू बताते हैं कि उनका न कोई संतान नहीं है,जो बुढ़ापे में सहारा बन सके।गुजर-बसर का भी कोई स्थायी रुप से कोई साधन नहीं दिन किसी तरह बीत जाता है, लेकिन रातें ठंड, डर और असहायता के बीच भारी पड़ जाती हैं। सुतली की बोरी ही इनके लिए कंबल और सुरक्षा कवच दोनों बन चुकी है।चिंताजनक तथ्य यह है कि क्षेत्र के कई गांवों में कंबल वितरण किया गया, लेकिन बरहेद गांव के इस वृद्ध दंपत्ति तक कोई सहायता नहीं पहुंची। न किसी जनप्रतिनिधि की नजर पड़ी और न ही प्रशासन ने इनकी सुध ली।यह मामला केवल एक परिवार की पीड़ा नहीं, बल्कि सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। सवाल यह है कि जब योजनाएं कागजों में मौजूद हैं, तो फिर ऐसे असहाय और जरूरतमंद लोग उनसे वंचित क्यों रह जाते हैं। अब देखना यह है कि खबर प्रकाशित होने के बाद प्रशासन इस वृद्ध दंपत्ति तक मदद पहुंचाता है या पूस की ठंड के साथ उनकी अनदेखी भी यूं ही जारी रहती है।

रिपोर्टर - मो0 साजिद

Leave a Reply



comments

Loading.....
  • No Previous Comments found.