E20 पेट्रोल का कड़वा सच! आम आदमी की जेब पर असर या सिर्फ भ्रम?

हाल ही में जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी यानी CJP के बैनर तले हुए छात्र आंदोलन ने सरकार की ईंट से ईंट बजा दी। हफ्तों तक कुछ न करने वाली सरकार को आख़िरकार झुकना पड़ा और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हो गया। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने देश के उस आम नागरिक के मन में एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है, जो हर सुबह पेट्रोल पंप पर अपनी बाइक या कार में तेल भरवाते वक्त खामोशी से सोचता है कि जो पैसे वो दे रहा है, उसमें असल में पेट्रोल कितना है और इथेनॉल कितना? क्या उसकी गाड़ी का माइलेज कम होना सिर्फ उसका भ्रम है? क्या उसकी परेशानी सिर्फ इसलिए नजरअंदाज हो जाएगी क्योंकि वह शांत है? क्या यह सरकार सिर्फ तभी सुनती है जब शोर, लाठियाँ आसमान छूने लगे? क्या शालीनता से टैक्स भरने वाले और चुपचाप काम करने वाले आम हिंदुस्तानी की कोई सुनवाई नहीं है? ऐसे में आइए इस रिपोर्ट में समझते हैं आंदोलन के उस डरावने पैटर्न और इथेनॉल ब्लेंडिंग के पीछे के पूरे कड़वे सच को! देखिए हमारी ये खास रिपोर्ट...

कुछ महीने पहले शुरू हुआ एक तंज...एक मजाक...धीरे-धीरे आंदोलन की पहचान बन गया। कॉकरोच जनता पार्टी...जिस नाम की शुरुआत व्यंग्य के तौर पर हुई थी...वही नाम देखते ही देखते हजारों युवाओं की आवाज बन गया। सोशल मीडिया पर युवाओं ने इसे हथियार बना लिया। इंस्टाग्राम रील्स...वीडियो...मीम्स और लाइव अपडेट के जरिए आंदोलन लगातार बढ़ता गया। आंदोलनकारियों ने सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए...पेपर लीक के मुद्दे को लेकर सड़क से संसद तक माहौल गर्म कर दिया। और फिर आया वो दिन...जब छात्रों ने संसद मार्च का ऐलान किया। सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव बढ़ा...पुलिस कार्रवाई हुई...और इसके बाद सियासी हलचल तेज हो गई। शुक्रवार तक सरकारी सूत्र दावा कर रहे थे कि शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान अपने पद पर बने रहेंगे। लेकिन शनिवार दोपहर तक तस्वीर बदल चुकी थी। धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया। यहीं से एक सवाल खड़ा हुआ...क्या सरकार ने दबाव में फैसला लिया? या फिर यह लंबे समय से चली आ रही नाराजगी का परिणाम था? 

लेकिन इस पूरी कहानी का दूसरा पहलू भी है। वो लाखों करोड़ों लोग...जो शांत हैं...जो अपनी नौकरी पर जाते हैं...जो टैक्स भरते हैं...जो हर महीने अपने खर्च का हिसाब लगाते हैं। वो ना जंतर-मंतर पर बैठ सकते हैं...ना हर समस्या पर आंदोलन कर सकते हैं। उनके सवाल छोटे लग सकते हैं...लेकिन उनकी परेशानियां बड़ी हैं। ऐसा ही एक बड़ा मुद्दा है पेट्रोल और इथेनॉल ब्लेंडिंग का। जी हां देश में पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने की नीति को सरकार ऊर्जा सुरक्षा से जोड़ती है। सरकार का तर्क है कि इससे कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम होगी...विदेशी मुद्रा की बचत होगी...और किसानों को भी फायदा मिलेगा। सरकार के आंकड़ों के मुताबिक इथेनॉल ब्लेंडिंग से देश ने बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा बचाई है। लेकिन दूसरी तरफ कुछ वाहन मालिकों की चिंता है कि पुराने वाहनों में ज्यादा इथेनॉल मिश्रण से माइलेज पर असर पड़ सकता है। कई लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या देश में सभी गाड़ियां इस बदलाव के लिए तैयार थीं?

क्या पेट्रोल पंपों और वाहन मालिकों को पूरी जानकारी दी गई? यही वो सवाल हैं जिनका जवाब आम आदमी चाहता है।
आपको बता दें मुद्दा सिर्फ इथेनॉल का नहीं है...मुद्दा है भरोसे का। जब कोई सरकार कोई बड़ा फैसला लेती है तो जनता चाहती है कि उसे पूरी जानकारी मिले। उसे सिर्फ आंकड़े नहीं चाहिए...उसे अपनी रोजमर्रा की परेशानी का समाधान चाहिए। अगर किसी गाड़ी का माइलेज कम हो रहा है...अगर खर्च बढ़ रहा है...तो उसे यह समझना जरूरी है कि वजह क्या है और समाधान क्या है।

आपको बता दें इस घटनाक्रम से एक बहुत ही खौफनाक राजनीतिक पैटर्न साफ होकर सामने आता है। यह सरकार यह नहीं देखती कि आपकी मांग में कितना दम है या आप सही हैं या गलत, यह सिर्फ यह देखती है कि आप कितना नुकसान पहुँचा सकते हैं और कितना लंबा टिक सकते हैं। जैसे...

शाहीन बाग का प्रदर्शन: कड़कती ठंड में महीने भर चले प्रदर्शन के बाद पूरे देश में NRC की चर्चा ठंडे बस्ते में चली गई और आज कोई इसका नाम तक नहीं लेता।

SC/ST कानून: हिंसक बंद के आगे सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के जजों के फैसले को पलटकर कानून को और सख्त कर दिया।

CJP का छात्र आंदोलन: सोशल मीडिया और सड़कों के शोर के आगे शिक्षा मंत्री की कुर्सी चली गई।

यानी साफ़ है, जो सरकार को डरा सकता है, सरकार उसके आगे झुक जाती है। लेकिन जो शालीन है, कामकाजी है और चुपचाप कतार में खड़ा है, उसे हवा में उड़ा दिया जाता है! वहीं अब बात करते हैं उस सबसे शांत आदमी की, जो रोज़ सुबह पेट्रोल पंप पर खड़ा है। उसके पास वायरल होने वाले फॉलोअर्स नहीं हैं, न ही वह एक महीने जंतर-मंतर पर डेरा डाल सकता है क्योंकि उसे नौकरी पर जाना है। लेकिन उसकी शिकायत बिल्कुल सच्ची और बुनियादी है। सरकार ने इथेनॉल ब्लेंडिंग यानि E20 पेट्रोल का टारगेट बिना पूरी तैयारी के तेजी से आगे बढ़ा दिया। 

20% इथेनॉल मिलावट का टारगेट पहले 2030 था, जिसे घटाकर 2025 और फिर 2023 कर दिया गया।

E20 के अनुकूल गाड़ियां 2023 के आसपास बाजार में आईं। लेकिन देश में सड़कों पर दौड़ रही ज्यादातर पुरानी गाड़ियां पतले मिश्रण के लिए बनी थीं। 

उन्हें E20 पिलाने से माइलेज 6 से 12 प्रतिशत तक गिर रहा है और नमी सोखने वाले इस फ्यूल से इंजन के गॉस्केट और होज़ पाइप खराब हो रहे हैं।

ईंधन में मिलावट करने वालों को अब खुलेआम एक कानूनी बहाना मिल गया है।

वहीं दूसरी तरफ नितिन गडकरी और हरदीप सिंह पुरी जैसे मंत्री आंकड़े देकर जनता को टेक्निकली अनपढ़ साबित करने में लगे हैं। देखा जाए तो कहानी यहां सिर्फ एक आंदोलन के खत्म होने की नहीं है...कहानी है उस संदेश की जो लोकतंत्र ने एक बार फिर दिया है। सत्ता चाहे कितनी भी मजबूत क्यों ना हो...जनता की आवाज को हमेशा नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लेकिन असली परीक्षा अब सरकार की है। क्या सरकार सिर्फ उन आवाजों को सुनेगी जो सड़कों पर उतरकर ताकत दिखाएंगी? या फिर उस आम नागरिक की परेशानी भी समझेगी जो बिना नारे लगाए...बिना प्रदर्शन किए...अपनी समस्या बता रहा है। क्योंकि लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि यहां सिर्फ तेज आवाज नहीं...बल्कि शांत सवालों का भी जवाब मिलना चाहिए। अब देखना होगा कि सरकार आने वाले समय में युवाओं के भरोसे को कितना मजबूत करती है...और आम आदमी की रोजमर्रा की चिंताओं पर कितना ध्यान देती है। 

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