15 हजार का वादा, 7 हजार की हकीकत: लखनऊ की सड़कों पर '1076' हेल्पलाइन का कोहराम!

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ, जो अपनी तहजीब के लिए जानी जाती है, कल एक अलग ही संग्राम की गवाह बनी। मुख्यमंत्री हेल्पलाइन 1076...वो नंबर जिस पर करोड़ों प्रदेशवासी अपनी उम्मीदें टिकाते हैं, बीते दिन उसी हेल्पलाइन के पहिए थम गए जब 200 से ज्यादा कर्मचारी, जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं शामिल थीं, अपनी सिसकियों और नारों के साथ सड़कों पर उतरी, तो प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए। 15 हजार का वादा और 7 हजार की हकीकत! मोबाइल फोन जब्त, दो महीने की रुकी हुई सैलरी और ऊपर से पुलिस की सख्ती। क्या ये लोकतंत्र है या आधुनिक बंधुआ मजदूरी? देखिए, लखनऊ के लोहिया पथ पर हुआ वो हाई-वोल्टेज ड्रामा जिसने सरकार की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं!

दरअसल, गुरुवार सुबह करीब 9:30 बजे का वक्त था। गोमतीनगर स्थित साइबर टावर के 'वी विन लिमिटेड' कंपनी के दफ्तर से अचानक 200 से ज्यादा कर्मचारियों का सैलाब बाहर निकला। ये कर्मचारी '1076 हाय-हाय' और 'शोषण बंद करो' के नारों के साथ मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर कूच करने लगे। प्रदर्शन इतना अचानक और उग्र था कि पुलिस को संभलने का मौका ही नहीं मिला। प्रदर्शनकारियों का जोश ऐसा था कि लोहिया पथ पर पुलिस ने उन्हें रोकने के लिए चार बार घेराबंदी की, लेकिन हर बार कर्मचारी बैरिकेडिंग तोड़कर आगे बढ़ते रहे। करीब 4.5 किलोमीटर पैदल मार्च करने के बाद जब यह काफिला संगीत नाटक अकादमी के पास पहुंचा, तो पुलिस ने भारी बल प्रयोग शुरू किया। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो इस प्रदर्शन की भयावहता बयां कर रहे हैं। वीडियो में साफ दिख रहा है कि महिला पुलिसकर्मी और पुरुष सिपाही प्रदर्शनकारी महिलाओं को जबरन घसीटते हुए बसों में भर रहे हैं। कहीं कोई महिला जमीन पर बैठकर रो रही है, तो कहीं धक्का-मुक्की में अफरा-तफरी मची है।

एक प्रदर्शनकारी महिला ने रुंधे गले से कहा, "हम कोई अपराधी नहीं हैं, हम अपने हक की बात कर रहे थे। लेकिन हमें ऐसे खींचा गया जैसे हम कोई गुनहगार हों।" वहीं वीडियो में पुलिस की इस सख्ती को लेकर लोगों में भारी नाराजगी देखी जा रही है, क्योंकि शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रही महिलाओं के साथ हुए इस व्यवहार ने संवेदनशीलता पर सवाल उठा दिए हैं। इतना ही नहीं प्रदर्शनकारी कर्मचारियों ने कंपनी के अंदर के जो हालात बताए, वो चौंकाने वाले हैं। उनका कहना है कि भर्ती के वक्त 15,000 रुपये सैलरी और हर 6 महीने में 1,000 रुपये बढ़ोतरी का वादा किया गया था। लेकिन हकीकत में उन्हें मात्र 7,000 से 8,000 रुपये दिए जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि पिछले दो महीने से सैलरी रोकी गई है, जिससे कर्मचारियों के सामने भुखमरी की नौबत आ गई है। कर्मचारियों का आरोप है कि ऑफिस में घुसते ही उनके मोबाइल फोन जमा करा लिए जाते हैं। अगर घर में कोई इमरजेंसी हो जाए, तो उन्हें शिफ्ट खत्म होने से पहले पता भी नहीं चलता। वे बाहरी दुनिया से पूरी तरह कट जाते हैं।

आपको बता दें सीएम हेल्पलाइन 1076 यूपी का वो 'बैकबोन' सिस्टम है जो IGRS के जरिए प्रदेश के 75 जिलों की शिकायतों को ट्रैक करता है। तहसील, पुलिस, बिजली, पानी और अस्पताल जैसी तमाम समस्याओं का समाधान यहीं से सुनिश्चित होता है। 'वी विन लिमिटेड' कंपनी आउटसोर्सिंग के जरिए इसका संचालन करती है। कर्मचारियों की मांग है कि या तो इस कंपनी को बदला जाए या उनका वेतन सम्मानजनक किया जाए।

देखा जाए तो लखनऊ की सड़कों पर बीते दिन जो कुछ भी हुआ, उसने एक बात साफ कर दी है कि जिस सिस्टम को लोगों की परेशानियां दूर करने के लिए बनाया गया था, उसके भीतर खुद एक बड़ा 'नासूर' पनप रहा है। 7000 रुपये की मामूली तनख्वाह में इस कमरतोड़ महंगाई में घर चलाना किसी चुनौती से कम नहीं, और जब आवाज उठाने पर लाठियां या घसीटा जाना मिले, तो आक्रोश और बढ़ जाता है। फिलहाल प्रशासन ने भरोसा दिया है कि मांगें सुनी जाएंगी, लेकिन सवाल वही है कि क्या डिजिटल इंडिया की इस चमक के पीछे आउटसोर्सिंग के नाम पर कर्मचारियों का शोषण यूं ही जारी रहेगा? या फिर इन 200 परिवारों को उनका वाजिब हक मिलेगा? लखनऊ से लेकर दिल्ली तक, अब सबकी नजरें सरकार के अगले कदम पर हैं। 

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