बहराइच में सीएम योगी बोले- नया भारत आक्रांताओं को स्वीकार नहीं करेगा।
Adarsh Kanoujia
नागपुर के बाद अब उत्तर प्रदेश के बहराइच में विदेशी आक्रांताओं को लेकर हलचल बढ़ गई है। दरअसल, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बहराइच की तहसील मिहींपुरवा (मोतीपुर) के मुख्य भवन के उद्घाटन कार्यक्रम शिरकत की। इस दौरान उन्होंने अपने संबोधन की शुरुआत में बहराइच की पहचान को महाराजा सुहेलदेव के शौर्य के साथ जोड़ा। योगी आदित्यनाथ ने सैयद सालार मसूद गाजी का बिना नाम लिए कहा कि विदेशी आक्रांता को महाराजा सुहेलदेव ने इस बहराइच में धूल धूसरित करने का काम किया था। बहराइच ऋषि बालार्क के नाम पर था।
सीएम योगी ने महाराजा सुहेलदेव और ऋषि बालार्क को बहराइच की पहचान बताते हुए कहा कि अधिकारी कर्मचारियों को अब अपने पोस्टिंग स्थल पर रात्रि निवास करना होगा।
योगी आदित्यनाथ ने कहा, "भारत की सनातन संस्कृति का गुणगान दुनिया कर रही है। हर नागरिक का दायित्व है कि वो भी ऐसा करे। किसी आक्रांता का महिमामंडन नहीं करना चाहिए। नया भारत आक्रांताओं को स्वीकार नहीं करेगा। आक्रांता के महिमामंडन का मतलब देशद्रोह है।
बहराइच में महाराजा सुहेलदेव स्मारक-
योगी सरकार ने सालार मसूद गाजी को हराने वाले महाराजा सुहेलदेव के नाम पर बहराइच में एक बड़ा स्मारक बनवाया है, जिसमें उनकी मूर्ति भी है। उन्होंने बहराइच के मेडिकल कॉलेज का नाम भी महाराजा सुहेलदेव के नाम पर रखा है।
बहराइच में किसके नाम पर विवाद?
1034 ईस्वी में बहराइच जिला मुख्यालय के समीप बहने वाली चित्तौरा झील के किनारे महराजा सुहेलदेव ने अपने 21 अन्य छोटे-छोटे राजाओं के साथ मिलकर सालार मसूद गाजी से युद्ध किया था और उसे युद्ध में पराजित कर मार डाला था। उसके शव को बहराइच में ही दफना दिया गया था, जहां सालाना जलसा होता है।
सालार मसूद गाजी और बहराइच से रिश्ता है-
जानकारों के मुताबिक, सालार मसूद गाजी 11वीं सदी में 1014 ईस्वी में अजमेर में पैदा हुआ था. वह महमूद गजनवी का भांजा था और उसका सेनापति भी था। अपनी तलवार के दम पर वह 1030-31 के आसपास अवध के इलाकों में आया और बहराइच-श्रावस्ती के इलाके में पहुंचा। उस समय यहां राजा सुहेलदेव का शासन था।
मुगल शासक ने बनवाया था मकबरा-
लोगों का मानना है कि जहां सालार मसूद को दफनाया गया, वहाँ पहले बालार्क ऋषि का आश्रम था और पास में एक कुंड था जिसे सूर्यकुंड कहते थे। दावा किया जा रहा है कि सालार मसूद की मौत के 200 साल बाद 1250 में दिल्ली के मुगल शासक नसीरुद्दीन महमूद ने उसकी कब्र पर मकबरा बनवाया और उसे संत बताया। बाद में फिरोज शाह तुगलक ने मकबरे के पास कई गुंबद बनवाए और अब्दी गेट लगवाए, जो बाद में सालार मसूद गाजी की दरगाह के नाम से मशहूर हुआ।
दरगाह पर हिंदू श्रद्धालु भी आते हैं-
इस दरगाह पर सिर्फ मुस्लिम ही नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में हिंदू श्रद्धालु भी आते हैं। यहाँ हर साल चार उर्स होते हैं, जिन्हें वक्फ नंबर 19 की कमेटी मनाती है। लेकिन मई-जून में एक महीने का बड़ा मेला लगता है, जिसमें लाखों हिंदू-मुस्लिम आते हैं और चादर चढ़ाते हैं। कई हिंदू श्रद्धालु अपनी मन्नतें पूरी होने पर 25-30 साल से यहां आ रहे हैं. उनके हाथों में लोहे के त्रिशूल होते हैं, जिनमें दिए लगे होते हैं, और वे उनकी पूजा करते हैं।

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