'कॉकरोच जनता पार्टी' का वो मैनिफेस्टो, जिसने सिस्टम की बत्ती गुल कर दी

सोशल मीडिया के समंदर में एक ऐसा चक्रवाती तूफान आया है, जिसने सियासत के बड़े-बड़े सूरमाओं के सिंहासन हिला दिए हैं! जरा सोचिए, जिस इंस्टाग्राम पर देश और दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी होने का दावा करने वाली भारतीय जनता पार्टी सालों की मेहनत के बाद भी 87 लाख फॉलोअर्स पर बैठी है...वहीं सिर्फ चंद दिनों पहले पैदा हुई एक ऐसी पार्टी ने उसे पटखनी दे दी है, जिसका कोई वजूद ही नहीं है! जी हां, इंटरनेट को हैक करते हुए डिजिटल दुनिया की नई 'महाशक्ति' बनकर उभरी है......'कॉकरोच जनता पार्टी'! ये कोई मज़ाक नहीं, बल्कि डिजिटल इंडिया का वो तड़कता-भड़कता सच है जिसने बड़े-बड़े पॉलिटिकल पंडितों के दिमाग की बत्ती गुल कर दी है। महज़ 4 दिन के अंदर इस पार्टी के इंस्टाग्राम हैंडल पर फॉलोअर्स की संख्या 10 करोड़ के पार पहुंच चुकी है! रफ्तार ऐसी कि शुरुआत के 24 घंटे में जहाँ सिर्फ 10 हजार लोग थे, वहीं अगले 48 घंटे में 5.5 लाख हुए, तीसरे दिन 62 लाख का आंकड़ा पार किया और अब यह डेढ़ करोड़ की तरफ तेजी से बढ़ रही है। इसके वीडियो पर 1 करोड़ से ज्यादा व्यूज आ रहे हैं। आखिर क्या है यह 'कॉकरोच जनता पार्टी'? कैसे देश के चीफ जस्टिस की एक टिप्पणी ने इस डिजिटल आंदोलन को हवा दी? और कौन है इस तूफान के पीछे का असली मास्टरमाइंड? आइए, आपको बताते हैं पूरी इनसाइड स्टोरी!

दरअसल, इस पूरी कहानी की शुरुआत होती है देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट से। पिछले शुक्रवार 15 मई को एक मामले की सुनवाई के दौरान देश के CJI सूर्यकांत ने देश के कुछ चुनिंदा बेरोजगार युवाओं को लेकर एक तल्ख टिप्पणी कर दी। उन्होंने ऐसे युवाओं को 'कॉकरोच' और 'परजीवी' कह दिया, जो खुद तो प्रोफेशनल दुनिया में अपनी जगह नहीं बना पाते, लेकिन बात-बात पर सिस्टम को कोसना शुरू कर देते हैं। बस फिर क्या था! हालांकि बाद में कोर्ट की तरफ से बकायदा सफाई दी गई कि चीफ जस्टिस का इरादा देश के आम और मासूम युवाओं पर टिप्पणी करना नहीं था, बल्कि यह गुस्सा उन लोगों के खिलाफ था जो फर्जी डिग्री लेकर घूमते हैं और इसका गलत अर्थ निकाला गया। लेकिन तब तक तीर कमान से छूट चुका था! सोशल मीडिया पर युवाओं का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। इस गुस्से और नाराजगी को भांपकर एक शातिर दिमाग ने इस 'कॉकरोच' शब्द को ही अपना सबसे बड़ा हथियार बना लिया और जन्म हुआ 'कॉकरोच जनता पार्टी' का!

खास बात ये है कि इस डिजिटल बवंडर के पीछे जो दिमाग काम कर रहा है, वो कोई नौसिखिया नहीं, बल्कि राजनीति की रग-रग से वाकिफ 30 साल का एक नौजवान है, जिसका नाम है अभिजीत दीपके। महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर के रहने वाले अभिजीत एक राजनीतिक संचार रणनीतिकार हैं। वे जानते हैं कि डिजिटल मीडिया पर नैरेटिव कैसे सेट किया जाता है और पब्लिक मैसेजिंग के जरिए लोगों की भावनाओं को कैसे भड़काया जाता है। आपको बता दें अभिजीत ने पुणे से जर्नलिज्म में ग्रेजुएशन की, जिसके बाद वे हायर एजुकेशन के लिए सीधे अमेरिका चले गए। वहां उन्होंने अमेरिका की मशहूर 'बोस्टन यूनिवर्सिटी' से पब्लिक रिलेशंस में 'मास्टर ऑफ साइंस' की डिग्री हासिल की। इतना ही नहीं, अभिजीत का पुराना पॉलिटिकल कनेक्शन भी है। साल 2020 से 2022 के बीच वे अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी की सोशल मीडिया टीम के अहम सिपाही रह चुके हैं। 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में जब 'आप' को बंपर जीत मिली थी, तब मीम्स के जरिए युवाओं को जोड़ने के पीछे इसी अभिजीत दीपके का दिमाग था। 

वे दिल्ली के शिक्षा विभाग में कम्युनिकेशंस एडवाइजर के तौर पर भी काम कर चुके हैं और फिलहाल एक इंटरव्यू में उन्होंने खुद माना कि वे जॉब के लिए अप्लाई कर रहे हैं। वहीं अभिजीत ने 16 मई को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक सिंपल सा गूगल फॉर्म शेयर किया था, और देखते ही देखते यह एक राष्ट्रीय डिजिटल आंदोलन बन गया। अब तक इस पार्टी की वेबसाइट पर 1 लाख से ज्यादा लोग आधिकारिक तौर पर जुड़ चुके हैं और पार्टी ने अपना एक गाना भी लॉन्च कर दिया है! दरअसल, 'कॉकरोच जनता पार्टी' कोई असली चुनाव लड़ने वाली पार्टी नहीं है, बल्कि यह एक व्यंग्यात्मक डिजिटल मोर्चा है। इसका टैगलाइन ही अपने आप में सिस्टम के मुंह पर करारा तमाचा है...'आलसी और बेरोजगार युवाओं की आवाज'। जी हां इस ग्रुप ने पार्टी में शामिल होने के लिए जो शर्तें रखी हैं, उन्हें सुनकर आप भी हंसने लगेंगे। 

पहली शर्त - बेरोजगारी: आपके पास कोई काम-धंधा नहीं होना चाहिए.

दूसरी शर्त - भयंकर आलसी होना: यानी 'डले रहो, पड़े रहो', कोई काम करने की जरूरत नहीं.

तीसरी शर्त - लगातार ऑनलाइन होना: यानी दिन में कम से कम 11 घंटे सोशल मीडिया और इंटरनेट की दुनिया में डूबे रहना.

चौथी शर्त - प्रोफेशनल रैंटर: यानी व्यवस्था और सिस्टम पर बिल्कुल प्रोफेशनल तरीके से, सलीके से अपनी भड़ास और शिकायतें निकालने की गजब की क्षमता होना.

आपको बता दें भले ही यह एक सटैरिकल आउटफिट है, जिसका मकसद चुनाव लड़ना नहीं है, लेकिन इसके घोषणापत्र में उठाए गए मुद्दे बेहद गंभीर हैं, जो सीधे देश के राजनीतिक और प्रशासनिक सिस्टम पर करारा प्रहार करते हैं. पार्टी ने 5 बड़े वादे किए हैं:

जजों पर लगाम: रिटायरमेंट के बाद किसी भी जज या चीफ जस्टिस को राज्यसभा में एंट्री नहीं।

चुनाव आयोग पर UAPA: वोटर लिस्ट से एक भी असली नाम कटा, तो चुनाव अधिकारियों पर सीधा UAPA यानि आतंकवाद विरोधी कानून लगेगा।

नेताओं की नो-एंट्री: दलबदलू सांसद या विधायक तुरंत अयोग्य होंगे; अगले 20 साल तक चुनाव लड़ने और सरकारी पद लेने पर परमानेंट बैन।

आधी आबादी को पूरा हक: देश की राजनीति और कैबिनेट में महिलाओं को सीधा 50% आरक्षण।

गोदी मीडिया का अंत: खबरों को प्रभावित करने वाले बड़े बिजनेसमैन और उद्योगपतियों के मीडिया हाउसेज के लाइसेंस तुरंत रद्द।

आपको बता दें ऐसा नहीं है कि इस कॉकरोच पार्टी को सिर्फ बेरोजगार युवा ही फॉलो कर रहे हैं। इसकी बढ़ती लोकप्रियता और सीधे सिस्टम पर चोट करने वाले अंदाज को देखकर देश के कई बड़े और चर्चित विपक्षी चेहरे भी इसके समर्थन में उतर आए हैं। तृणमूल कांग्रेस की फायरब्रांड सांसद महुआ मोइत्रा, पूर्व क्रिकेटर और नेता कीर्ति आजाद, और सुप्रीम कोर्ट के जाने-माने वरिष्ठ वकील व आम आदमी पार्टी के पूर्व नेता प्रशांत भूषण जैसी दिग्गज शख्सियतों ने भी इस मुहिम को अपना डिजिटल सपोर्ट दिया है। हालांकि, यह कहना भी पूरी तरह सही नहीं होगा कि 1 करोड़ से ज्यादा जितने भी फॉलोअर्स इस हैंडल पर आए हैं, वो सब इस पार्टी को पसंद ही करते हैं। दरअसल, सोशल मीडिया का सिस्टम एल्गोरिद्म पर चलता है। जब कोई कंटेंट तेजी से लाइक, कमेंट और शेयर बटोरता है, तो इंस्टाग्राम उसे और लोगों तक धकेलता है। इस पार्टी के छोटे-छोटे वीडियो में गुस्सा, रोष और कॉमेडी का ऐसा मिक्स वर्जन है कि लोग खुद को इससे कनेक्ट होने से रोक नहीं पा रहे हैं।

जाहिर है आज की डिजिटल दुनिया में सोशल मीडिया की ताकत क्या है, 'कॉकरोच जनता पार्टी' इसका सबसे बड़ा और जीता-जागता सबूत है। कहाँ कांग्रेस जैसी पुरानी पार्टी 1.3 करोड़ फॉलोअर्स के लिए सालों से जूझ रही है, आम आदमी पार्टी महज़ 19 लाख पर सिमटी है, और बीजेपी जैसी दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी 87 लाख पर है...ऐसे में वहां एक अदृश्य 'कॉकरोच' सेना ने आकर सबको पीछे छोड़ दिया है। भले ही इसे एक मजाक, एक मीम ट्रेंड या युवाओं की भड़ास कहकर खारिज करने की कोशिश की जाए, लेकिन 1 करोड़ से ज्यादा फॉलोअर्स की ये चीखती हुई संख्या ये बताने के लिए काफी है कि देश के युवाओं के भीतर बेरोजगारी और सिस्टम को लेकर कितनी गहरी निराशा और गुस्सा भरा है। आज का युवा अपनी बात कहने के लिए सड़कों पर पत्थर उठाने के बजाय डिजिटल रील और मीम्स को अपना हथियार बना रहा है। अब देखना यह है कि यह 'मेलोडी टॉफी' की तरह सिर्फ एक सोशल मीडिया ट्रेंड बनकर रह जाता है, या फिर आने वाले वक्त में देश की मुख्यधारा की राजनीति के लिए एक बड़ा सबक साबित होता है। 

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