कम लागत, कम समय और अच्छा मुनाफा: हरी धनिया की खेती बन रही किसानों की पसंद
उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में किसान अब पारंपरिक फसलों से हटकर सब्जियों और नकदी फसलों की ओर रुख कर रहे हैं। इनमें हरी धनिया की खेती तेजी से लोकप्रिय हो रही है। कम निवेश, जल्दी तैयार होने वाली फसल और बाजार में अच्छी कीमत मिलने के कारण यह खेती किसानों के लिए लाभकारी विकल्प साबित हो रही है।
बाराबंकी जिले के बरहाहार गांव के किसान दीपू वर्मा इसका एक उदाहरण हैं। उन्होंने अपनी एक बीघा जमीन में हरी धनिया की खेती करके प्रति फसल लगभग 30 से 40 हजार रुपये तक का लाभ कमाया है। खास बात यह है कि इसमें लागत बेहद कम, लगभग 1000 से 1500 रुपये प्रति बीघा आती है।
हरी धनिया की फसल आमतौर पर 25 से 30 दिनों में तैयार हो जाती है। गर्मियों के मौसम में इसकी मांग बढ़ जाती है, जिससे बाजार में अच्छे दाम मिल जाते हैं और किसानों को सीधा फायदा होता है। समय पर कटाई और सही तरीके से बिक्री करने पर यह फसल नियमित आय का अच्छा स्रोत बन सकती है।
खेती की प्रक्रिया भी सरल मानी जाती है। सबसे पहले खेत की अच्छी तरह जुताई करके मिट्टी को भुरभुरा बनाया जाता है। इसके बाद बीजों की बुवाई की जाती है और खेत को समतल कर दिया जाता है। शुरुआती चरण में उचित नमी बनाए रखना जरूरी होता है। करीब दो सप्ताह बाद सिंचाई की जाती है और लगभग एक महीने के भीतर फसल कटाई के लिए तैयार हो जाती है।
कम समय में तैयार होने वाली यह फसल किसानों को बार-बार उत्पादन और बिक्री का अवसर देती है। यही कारण है कि छोटे और सीमांत किसान भी इसे अपनाने लगे हैं। हरी धनिया की खेती न केवल आय बढ़ाने में मदद कर रही है, बल्कि किसानों को कम जोखिम में बेहतर रिटर्न भी दे रही है।
आने वाले समय में यदि सही तकनीक, बाजार की समझ और प्रबंधन के साथ इस फसल को अपनाया जाए, तो यह किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने में अहम भूमिका निभा सकती है।

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