गौ सेवा: समाज, संस्कृति और आध्यात्म का संगम
भारतीय सनातन संस्कृति में धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन के प्रत्येक प्राणी के प्रति कर्तव्य का नाम है। इसी धर्मबोध का सबसे पवित्र और जीवंत स्वरूप है गौ सेवा। गाय को भारतीय शास्त्रों में माता, धन और धर्म का आधार माना गया है। इसलिए गौ सेवा को केवल सामाजिक कार्य नहीं, बल्कि धार्मिक कर्तव्य (धर्म) माना गया है।
शास्त्रों में गौ का स्थान
वेद और उपनिषद
ऋग्वेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद में गाय को अघ्न्या कहा गया है — अर्थात् जिसे मारा न जाए।
ऋग्वेद में कहा गया है कि गायें मानव जीवन के लिए समृद्धि और कल्याण लाती हैं।
- “गावो विश्वस्य मातरः”
- अर्थात् गाय सम्पूर्ण सृष्टि की माता है।
पुराणों में गौ महिमा
- स्कंद पुराण और पद्म पुराण में उल्लेख है कि “गौ सेवा से सभी पापों का नाश होता है और मनुष्य को वैकुण्ठ की प्राप्ति होती है।”
- ब्रह्मवैवर्त पुराण में कहा गया है कि गाय के शरीर में 33 करोड़ देवी-देवताओं का वास होता है।
इस कारण गौ सेवा को देव सेवा के समान माना गया है।
गौ सेवा और कर्म सिद्धांत
सनातन धर्म में कर्म का सिद्धांत अत्यंत महत्वपूर्ण है।
गौ सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म माना गया है क्योंकि:
- यह निःस्वार्थ सेवा है
- इसमें करुणा और अहिंसा निहित है
- यह जीवन रक्षक कार्य है
भगवद गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं:
- “अहिंसा परमो धर्मः”
गौ सेवा अहिंसा का साकार रूप है।
गौ सेवा और यज्ञ परंपरा
प्राचीन काल में यज्ञ, हवन और धार्मिक अनुष्ठान गौ-घृत (घी) के बिना पूर्ण नहीं माने जाते थे।
गौ उत्पाद —
- दूध
- दही
- घी
- गोमूत्र
- गोबर
इन पाँचों से बनने वाला पंचगव्य धार्मिक शुद्धि और आयुर्वेदिक उपचार में अत्यंत पवित्र माना गया है।
गौ सेवा करना अर्थात तीर्थ सेवा करना
शास्त्रों में कहा गया है:
- “ग्रामे ग्रामे वसेद् गौः, तत्र तत्र हरिः स्वयं।”
अर्थात जहाँ गाय निवास करती है, वहाँ भगवान स्वयं वास करते हैं।
इसी कारण कई संतों और आचार्यों ने कहा है कि:
- गौशाला तीर्थ के सामान है
- गौ सेवा तीर्थ यात्रा से भी श्रेष्ठ मणि गयी है
संतों और महापुरुषों की दृष्टि
- महात्मा गांधी ने कहा था: “गाय की रक्षा भारत की संस्कृति की रक्षा है।”
- स्वामी दयानंद सरस्वती ने गौ रक्षा को वैदिक धर्म का अनिवार्य अंग बताया।
- अनेक संतों ने गौ सेवा को कलियुग का सरल धर्म कहा है।
कलियुग में गौ सेवा का महत्व
कलियुग में जहाँ:
- हिंसा बढ़ रही है
- संवेदना कम हो रही है
- धर्म कर्मकाण्ड तक सीमित हो गया है
वहाँ गौ सेवा:
- धर्म को जीवन व्यवहार में उतारती है
- मनुष्य में करुणा और दया जागृत करती है
- समाज को सात्त्विक मार्ग की ओर ले जाती है
शास्त्रों के अनुसार, कलियुग में गौ सेवा करने वाला व्यक्ति अल्प प्रयास में महान पुण्य प्राप्त करता है।
धार्मिक दृष्टि से गौ सेवा:
- केवल पशु सेवा नहीं
- बल्कि धर्म, करुणा, अहिंसा और भक्ति का समन्वय है
गौ की सेवा करना अर्थात:
- माता की सेवा
- धरती की रक्षा
- धर्म की रक्षा
अतः गौ सेवा को अपनाना न केवल धार्मिक कर्तव्य है, बल्कि यह समाज, पर्यावरण और मानव जीवन के लिए भी सर्वोपरि योगदान है। जो समाज अपनी मातृगाय की रक्षा करता है, वही समाज वास्तव में अपने धर्म, संस्कृति और नैतिक मूल्यों की रक्षा करता है।

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