"रोता बचपन" - एक ऐसी रचना जो आपको भी बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर देगी

गरीबी वो चीज है जो इन्सान को किसी भी हद तक जाने पर मजबूर कर देती है .वो गरीबी ही है जो बच्चों से उनका बचपन छीनकर जितनी उम्र नही होती उससे अधिक बढ़ा और समझदार बना देती है .जिन कंधों पर पुस्तकों से भरा बस्ता होना चाहिए उन पर जिम्मेदारियों का बोझा लाद देती है .इसी गरीबी पर आधारित मेरी ये रचना जो आपको बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर देगी ...
खिलौने और मैदान के झूले को निहारती लालचभरी निगाहें।
कैसे वो बच्चा मन मार कर रह जाता है.
स्कूल के बस्ते को उठाने की उम्र में वो जिम्मेदारियों का बोझ उठाता है।
जिद करने की उम्र में वो जरुरतें पूरी करता है|
हम ब्रांडेड जूते चप्पल पहनते है
वो नगें पैर मीलों चलता रहता है।
हम महलों में रहते हैं
और वो चारदीवारी को तरसता है।
उसका पूरा दिन कूड़े के ढेर में गुजरता है
पर किसी का दिल उसके लिए नहीं पसीजता है।
उसका बचपन हर रोज जोरो से रोता है,
पर किसी को सुनाई नहीं देता है.
जुबां होने पर भी बेंजुबा बन क सब सहता है।
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