किरंदुल-बचेली में बीटीओए की गड़बड़ी: प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की चुप्पी
किरंदुल – बचेली लोह अयस्क उत्पादन क्षेत्र में बैलाडिला ट्रक ऑनर्स एसोसिएशन (बीटीओए) कभी स्थानीय युवाओं को स्वरोज़गार देने और छोटे ट्रक मालिकों को संगठित करने के उद्देश्य से शुरू की गई संस्था मानी जाती है। एनएमडीसी की खदानों से निकलने वाले लौह अयस्क के सड़क मार्ग परिवहन में इसी एसोसिएशन के ट्रक वर्षों से मुख्य भागीदार रहे हैं, जिससे यहां का संपूर्ण परिवहन तंत्र कुछ चुनिंदा संगठनों पर निर्भर होता गया। बीटीओए किस स्पष्ट सरकारी नियम–प्रणाली के तहत संचालित होती है और इसकी आंतरिक सदस्यता–नीति पर किस विभाग की निगरानी है, यह आज भी सार्वजनिक रूप से पूरी पारदर्शिता के साथ सामने नहीं है। लौह अयस्क परिवहन से जुड़े समूचे तंत्र पर खनिज नियम, परिवहन नियम और वन भूमि से जुड़े प्रावधान तो लागू होते हैं, पर स्थानीय स्तर पर एसोसिएशन की सदस्यता बांटने, ट्रकों की संख्या तय करने और रूट–परमिट के बंटवारे जैसे सवालों पर प्रशासनिक चुप्पी ने संदेह और बढ़ा दिया है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि जो व्यवस्था कभी स्वरोज़गार के नाम पर शुरू हुई थी,आज वहीं से कुछ चुनिंदा व्यक्ति विशेष को 10 से 35 ट्रकों तक का संचालन अधिकार दिया जा रहा है, जबकि नया सदस्य एक ट्रक के साथ भी जुड़ना चाहे तो उसे जगह नहीं मिलती। यह मॉडल सैकड़ों ट्रकों की तादाद तक जा पहुंचा है, जिससे छोटे, नए ट्रक मालिक बाहर रह जाते हैं और क्षेत्रीय परिवहन कारोबार कुछ परिवारों या गुटों के कब्ज़े जैसा दिखने लगा है। नगर की सड़कों और आसपास की वन भूमि पर अब ट्रकों की अनौपचारिक–सी दिखने वाली विशाल पार्किंग कतारें आम नज़ारा बन चुकी हैं,जबकि इन्हीं क्षेत्रों में अन्य सार्वजनिक कार्यों, पुलिया या आधारभूत ढांचा निर्माण के लिए भूमि मिलना बेहद कठिन बताया जाता है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन सड़कों और वन भूमि पर बनाई गई पार्किंग के लिए क्या किसी तरह की औपचारिक अनुमति, लीज़ या समझौता किया गया है, और यदि किया गया है तो यह सार्वजनिक समझौता है या किसी निजी संस्था के साथ किया गया गुप्त अनुबंध। सैकड़ों भारी वाहनों की आवाजाही और सड़क किनारे खड़ी कतारों के चलते धूल–धुआं, शोर और हादसों का ख़तरा लगातार बढ़ा है, जिसका असर आम नागरिकों के स्वास्थ्य और रोजमर्रा की आवाजाही पर साफ दिख रहा है। बावजूद इसके, न तो प्रशासन की ओर से ट्रक पार्किंग के लिए सुरक्षित वैकल्पिक ज़ोन घोषित किए गए हैं, न ही जनप्रतिनिधियों ने खुले मंच पर यह बताया है कि मौजूदा व्यवस्था से वसूले जा रहे किसी संभावित शुल्क का लाभ क्या सचमुच जनता को लौट रहा है या फिर जनता सिर्फ़ मुफ़्त में धूल और एक्सीडेंट का बोझ ढो रही है। वन संरक्षण कानूनों के तहत किसी भी परियोजना के लिए जंगल की ज़मीन हस्तांतरित करने में लंबी कानूनी प्रक्रिया, पर्यावरणीय स्वीकृति और उच्च स्तर की मंज़ूरी की ज़रूरत होती है, जिसका हवाला यहां खनन परियोजनाओं और अन्य निर्माण के मामलों में नियमित रूप से दिया जाता है। ऐसे में यह प्रश्न और तीखा होता है कि अगर ट्रक पार्किंग के लिए वन भूमि का व्यापक उपयोग हो रहा है, तो उसका आधार क्या है, कौन सी एजेंसी ज़िम्मेदार है और क्या उस अनुमति का कोई सार्वजनिक दस्तावेज उपलब्ध है जिसे आम जनता देख सके। स्थानीय नागरिकों के सामने आज कुछ सीधे सवाल खड़े हैं– ट्रक पार्किंग के लिए सड़क और वन भूमि किस अधिकृत प्रक्रिया से दी गई, यदि शुल्क वसूला जा रहा है तो उसका हिसाब–किताब कहां है, और इस व्यवस्था से असल लाभ किसके पास पहुंच रहा है। यदि यह निजी समझौता है तो उसकी शर्तें सार्वजनिक क्यों नहीं की जातीं, और यदि यह प्रशासनिक व्यवस्था है तो फिर जवाबदेही से प्रशासन और जनप्रतिनिधि मौन क्यों हैं। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि संबंधित विभाग इस पूरे प्रकरण पर पारदर्शी जांच और स्पष्ट जवाब देता है या फिर किरंदुल–बचेली की जनता और भी लंबे समय तक धूल, भीड़ और ख़तरे के बीच ही अपने सवाल दोहराती रह जाती है।
रिपोर्टर - जी.एल.मरावी
No Previous Comments found.