कंपनियों के मुनाफे के आगे देश के नागरिकों की सेहत सस्ती...!

भारत में आयात होने वाली दालों और सोयाबीन में 'ग्लाइफोसेट' नामक विवादित खरपतवारनाशी की मौजूदगी पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की कैंसर अनुसंधान एजेंसी इसे संभावित कैंसरकारी मान चुकी है। ऐसे में यह आशंका गहरा गई है कि क्या अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक समझौतों और कंपनियों के मुनाफे के आगे देश के नागरिकों की सेहत को नजरअंदाज किया जा रहा है?
 
FSSAI की चेतावनी और नियमों में ढील
 
भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) के आंतरिक दस्तावेजों से साफ है कि संस्था इस खतरे से वाकिफ थी। फाइलों में दर्ज था कि आयातित दालों में ग्लाइफोसेट की अत्यधिक मात्रा भारतीय उपभोक्ताओं की सेहत को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है। इसके बावजूद, सुरक्षा कड़े करने के बजाय अंतरराष्ट्रीय संस्था 'कोडेक्स' के उदार मानकों को अपना लिया गया। भारत के बुनियादी नियम  को ताक पर रखकर मसूर और मटर के लिए 5 mg/kg और सोयाबीन के लिए 20 mg/kg तक की खतरनाक सीमा को कानूनी मंजूरी दे दी गई।
 
विशेषज्ञों की चिंता: थाली में धीमा जहर
 
विशेषज्ञों के मुताबिक, चूंकि भारत में दालें रोजमर्रा के भोजन का मुख्य हिस्सा हैं, इसलिए यह केमिकल धीरे-धीरे लोगों के शरीर में जमा हो रहा है। सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि भारत सरकार ने देश के किसानों के लिए खाद्य फसलों पर इसके इस्तेमाल को प्रतिबंधित कर रखा है, लेकिन विदेशों से आने वाली दालों को खुली छूट दी जा रही है। यह न सिर्फ जनस्वास्थ्य बल्कि हमारे स्थानीय किसानों के साथ भी नाइंसाफी है।
 
भारतीय कानून बनाम जमीनी हकीकत
 
केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड के नियमों के अनुसार, भारत में ग्लाइफोसेट का उपयोग केवल चाय के बागानों और गैर-फसली क्षेत्रों में ही मान्य है। किसी भी खाद्य फसल (धान, गेहूं, दालों) पर इसका छिड़काव गैरकानूनी है। इसके बावजूद, जमीनी हकीकत यह है कि देश के कई हिस्सों में कपास, गन्ने और मक्के की फसलों में इसका अवैध रूप से धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जा रहा है।
 
अमीर देशों का दोहरा रवैया और व्यापारिक मजबूरी
 
यह पूरा मामला अंतरराष्ट्रीय व्यापार के दोहरे मानदंडों को उजागर करता है। कनाडा और यूरोपीय संघ जैसे देश जब भारत से चाय या चावल आयात करते हैं, तो 0.01 mg/kg की 'जीरो टॉलरेंस' नीति अपनाते हैं और मामूली अंश मिलने पर भी खेप वापस कर देते हैं। दूसरी तरफ, भारत में दालों की कमी पूरी करने और विश्व व्यापार संगठन के नियमों का हवाला देकर ऐसी ढीली नीति को सही ठहराया जाता है। सवाल यही है कि क्या कोई भी व्यापारिक संधि देश के करोड़ों नागरिकों की जान से बढ़कर हो सकती है?

Leave a Reply



comments

Loading.....
  • No Previous Comments found.