दातागंज में कभी हाथी की दहाड़, तो कभी खिला कमल...जानिए क्या है इस सीट का इतिहास!

उत्तर प्रदेश की राजनीति का जब भी जिक्र होता है, तो बदायूं जिले की चर्चा अपने आप गर्म हो जाती है। और जब बात बदायूं की दातागंज विधानसभा सीट (संख्या 117) की हो, तो सियासत का पारा सातवें आसमान पर पहुंच जाता है। यह कोई आम सीट नहीं है, बल्कि यहां का सियासी इतिहास ऐसा उतार-चढ़ाव भरा है कि हर चुनाव में जनता ने पुराने समीकरणों को ताक पर रखकर नए इतिहास रचे हैं। कभी हाथी की चाल मजबूत थी, तो कभी कमल ऐसा खिला कि विरोधियों के होश उड़ गए! आइए, सिलसिलेवार तरीके से खोलते हैं दातागंज के सियासी पत्तों को और जानते हैं कि पिछले तीन चुनावों में यहां असल खेल क्या रहा है।

साल 2012 का विधानसभा चुनाव राजनीतिक पंडितों के लिए भी सिरदर्द साबित हुआ था। मुकाबला किसी एकतरफा पिच पर नहीं था, बल्कि चौतरफा जंग थी। बहुजन समाज पार्टी (BSP) के टिकट पर मैदान में उतरे सिनोद कुमार शाक्य (दीपु भैया) ने यहां ऐसा दांव चला कि बाजी अपने नाम कर ली।

किसको मिले कितने वोट:

विजेता (BSP): सिनोद कुमार शाक्य -63,626 वोट

दूसरे नंबर पर (SP): प्रेमपाल सिंह यादव -58,299 वोट

तीसरे नंबर पर (Congress): डॉ. शैलेश पाठक -53,487 वोट

चौथे नंबर पर (BJP): राजीव सिंह उर्फ बब्बू भैया -14,368 वोट

यह मुकाबला सिर्फ दो दलों के बीच का नहीं था। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के उम्मीदवारों ने भी बीएसपी को कांटे की टक्कर दी। फासला सिर्फ 5,327 वोटों का था, यानी हार-जीत का अंतर इतना कम कि सांसें थाम देने वाला मुकाबला! लेकिन अंत में बाजी हाथी के पाले में गई और सिनोद कुमार शाक्य विधायक बने। पाँच साल बीते, हवा बदली और सियासी जमीन भी हिल गई। साल 2017 में बीजेपी की सुनामी पूरे यूपी में ऐसी चली कि दातागंज का किला भी ढह गया। वही राजीव सिंह उर्फ बब्बू भैया, जो 2012 के चुनाव में चौथे पायदान पर हांफ रहे थे, 2017 में बीजेपी के टिकट पर उतरे और मैदान ऐसा मारा कि देखने वाले देखते रह गए।

किसको मिले कितने वोट:

विजेता (BJP): राजीव कुमार सिंह उर्फ बब्बू भैया -79,110 वोट

दूसरे नंबर पर (BSP): सिनोद कुमार शाक्य -53,351 वोट

जीत का अंतर: 25,759 वोट

पिछली बार के विजेता सिनोद कुमार शाक्य अपनी सीट नहीं बचा पाए और बीजेपी के बब्बू भैया ने 25 हजार से ज्यादा वोटों के भारी-भरकम अंतर से बीएसपी को धूल चटा दी। दातागंज की जनता ने दिखा दिया कि यहां पुराना इतिहास ज्यादा दिन टिकता नहीं, वक्त के साथ मूड बदलना यहां की पुरानी आदत है।

साल 2022 का चुनाव यानी हालिया विधानसभा चुनाव, जिसने दातागंज में रोमांच की सारी हदें पार कर दीं। बीजेपी ने एक बार फिर अपने सिपहसालार राजीव सिंह उर्फ बब्बू भैया पर दांव खेला। बीजेपी जीती तो जरूर, लेकिन इस बार मुकाबला एकतरफा बिल्कुल नहीं था। समाजवादी पार्टी के अर्जुन सिंह ने मैदान में ऐसा पसीना बहाया और कड़ी टक्कर दी कि बीजेपी खेमे की सांसें अटक गई थीं।

किसको मिले कितने वोट:

विजेता (BJP): राजीव सिंह उर्फ बब्बू भैया -1,07,591 वोट

दूसरे नंबर पर (SP): अर्जुन सिंह -98,115 वोट

तीसरे नंबर पर (BSP): रचित गुप्ता -20,571 वोट

चौथे नंबर पर (Congress): आतिफ खान -2,413 वोट

जीत का अंतर: मात्र 9,476 वोट

भले ही कमल लगातार दूसरी बार खिल गया हो, लेकिन जीत का मार्जिन 2017 के 25 हजार से घटकर सीधे 9 हजार के आसपास आ गया। समाजवादी पार्टी की इस दमदार चुनौती ने साफ कर दिया कि दातागंज में मुकाबला अब पूरी तरह आर-पार का हो चुका है।

इतिहास के पन्ने कहते हैं अगर थोड़ा और पीछे झांकें, तो दातागंज का मिजाज हमेशा से हैरान करने वाला रहा है। 2002 में समाजवादी पार्टी के प्रेमपाल सिंह यादव यहां के सिकंदर बने थे। 2007 में बीएसपी के टिकट पर सिनोद कुमार शाक्य ने बाजी मारी थी। 2012 में फिर सिनोद कुमार शाक्य जीते (BSP)। 2017 और 2022 में लगातार दो बार बीजेपी के राजीव सिंह उर्फ बब्बू भैया ने कब्जा जमाया। यानी कभी साइकिल दौड़ी, तो कभी हाथी ने चाल चली, और अब पिछले दो चुनावों से कमल मजबूती से अपनी जड़ें जमाए बैठा है।

अब जब नजरें अगले चुनावी दंगल पर टिकी हैं, तो जनता के मन में भी सवाल उठने लाजिमी हैं। इस बार सिर्फ हवा या नारे नहीं चलेंगे, बल्कि इन ग्राउंड जीरो के मुद्दों पर वोटों की तौल होगी। गांवों की टूटी सड़कें, लड़खड़ाती बिजली और पीने के साफ पानी की किल्लत। किसानों के खेत, सिंचाई के साधन और उनकी फसलों के दाम। सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों का हाल क्या मरीजों को वाकई इलाज मिल रहा है या सिर्फ कागजों पर चल रहा है सिस्टम? सरकारी स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई का स्तर और युवाओं के लिए रोजगार के नए रास्ते। सबसे बड़ा सवाल जनता के बीच विधायक जी की मौजूदगी और उनके कराए गए विकास कार्यों का रिपोर्ट कार्ड!

दातागंज की यह सियासत किसी फिल्मी ड्रामे से कम नहीं है। एक तरफ बीजेपी अपनी लगातार दो बार की जीत के सिलसिले को बरकरार रखने के लिए पूरी ताकत झोंकने को तैयार है, तो वहीं विपक्षी दल इस बार की कमियों को हथियार बनाकर वापसी की जुगत में हैं। जनता किसे चुनेगी, कौन बाजी मारेगा और इस बार ऊंट किस करवट बैठेगा यह आने वाला वक्त ही बताएगा। लेकिन इतना तय है कि दातागंज का अगला चुनावी रण बेहद रोमांचक और कांटे की टक्कर वाला होने वाला है!

Leave a Reply



comments

Loading.....
  • No Previous Comments found.