सरकारी स्कूलों पर बड़ा सवाल: देश में 94 हजार स्कूल बंद होने का दावा, उत्तराखंड में 1520 स्कूल क्लस्टर सिस्टम में शामिल

देहरादून :  देश में सरकारी स्कूलों की संख्या, घटते नामांकन और स्कूलों के विलय को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। एक ओर केंद्र और राज्य सरकारें सरकारी विद्यालयों में आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराने और शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने का दावा कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर कम छात्र संख्या, शिक्षकों की कमी, स्कूलों के विलय और क्लस्टर सिस्टम को लेकर सवाल उठ रहे हैं। पिछले करीब एक दशक में देशभर में लगभग 94 हजार सरकारी स्कूलों के बंद या दूसरे विद्यालयों में विलय किए जाने का दावा सामने आया है। हालांकि, इस आंकड़े की आधिकारिक पुष्टि और इसके स्रोत की स्पष्टता जरूरी है, इसलिए इसे फिलहाल दावे के रूप में ही देखा जाना चाहिए। इसी दावे के अनुसार सरकारी स्कूलों में नामांकन में भी करीब 2.26 करोड़ की कमी आई है और कुल नामांकन में सरकारी स्कूलों की हिस्सेदारी वर्ष 2005 के करीब 71 प्रतिशत से घटकर 2024-25 में लगभग 49.2 प्रतिशत रह गई है।

उत्तराखंड में 1520 स्कूलों का क्लस्टर सिस्टम

उत्तराखंड में भी सरकारी विद्यालयों की व्यवस्था को लेकर क्लस्टर सिस्टम चर्चा में है। शिक्षा विभाग के अनुसार प्रदेश के हाईस्कूल और इंटरमीडिएट स्तर के करीब 2,250 से 2,295 विद्यालयों में से लगभग 1,520 विद्यालयों को 559 क्लस्टर स्कूलों से जोड़े जाने की योजना है।

सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य स्कूल बंद करना नहीं, बल्कि आसपास के विद्यालयों के संसाधनों को बेहतर तरीके से इस्तेमाल करते हुए विद्यार्थियों को आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराना है। क्लस्टर स्कूलों में स्मार्ट क्लास, वर्चुअल क्लास, टिंकरिंग लैब, कंप्यूटर लैब, प्रयोगशाला, पुस्तकालय, खेल मैदान और अन्य सुविधाएं विकसित करने की योजना बताई गई है।

सरकार का दावा- एक भी स्कूल बंद नहीं होगा

शिक्षा मंत्री धन सिंह रावत के अनुसार सरकार किसी विद्यालय को बंद या मर्ज नहीं कर रही है। उनका कहना है कि जिस विद्यालय में एक भी बच्चा पढ़ रहा है, उसे मर्ज नहीं किया जाएगा।

सरकार 559 क्लस्टर स्कूलों के साथ 225 पीएमश्री विद्यालयों को भी विकसित करने की दिशा में काम कर रही है। क्लस्टर स्कूलों में हॉस्टल सुविधा विकसित करने तथा दूर-दराज से आने वाले विद्यार्थियों के लिए आवागमन संबंधी आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने की योजना भी बताई गई है।

माध्यमिक शिक्षा विभाग के निदेशक मुकुल कुमार सती के अनुसार करीब 1,520 विद्यालयों को 559 क्लस्टर स्कूलों के साथ जोड़ा जा रहा है। जिन विद्यालयों के आसपास दूसरा विद्यालय उपलब्ध नहीं है, उन्हें अपने स्तर पर क्लस्टर के रूप में संचालित किए जाने की बात कही गई है।

स्कूल बंद नहीं तो बदलाव किस स्तर पर?

सरकार की ओर से इसे स्कूल बंद करने की बजाय क्लस्टर व्यवस्था बताया जा रहा है, लेकिन सवाल यह है कि यदि किसी विद्यालय के विद्यार्थियों को दूसरे विद्यालय में जाना पड़ेगा तो उनकी सुरक्षित और नियमित आवाजाही कैसे सुनिश्चित होगी।

विशेषकर पर्वतीय क्षेत्रों में विद्यालयों के बीच दूरी, खराब सड़कें, मौसम और परिवहन की सीमित सुविधाएं बड़ी चुनौती हैं। ऐसे में क्लस्टर व्यवस्था की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि विद्यार्थियों को स्कूल तक पहुंचने के लिए वास्तविक स्तर पर कितनी सुविधाएं मिलती हैं।

शिक्षकों की कमी भी बड़ी चुनौती

उत्तराखंड के सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों की उपलब्धता भी लंबे समय से चर्चा का विषय रही है। पौड़ी गढ़वाल के एक विद्यालय में कथित तौर पर करीब 232 विद्यार्थियों की जिम्मेदारी एक शिक्षक पर होने का मामला सामने आने का दावा किया गया है। यदि यह आंकड़ा आधिकारिक रूप से सही पाया जाता है तो यह शिक्षक-विद्यार्थी अनुपात और शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है।

इसी तरह टिहरी गढ़वाल में करीब 240 विद्यालयों के प्रभावित होने का दावा भी किया जा रहा है। इन आंकड़ों की आधिकारिक पुष्टि आवश्यक है, लेकिन पर्वतीय जिलों में कम छात्र संख्या, शिक्षकों की कमी और विद्यालयों की दूरी वास्तविक चुनौतियां हैं।

स्मार्ट क्लास से आगे भी जरूरी हैं शिक्षक और पहुंच

आलोचकों का कहना है कि सरकारी विद्यालयों में स्मार्ट क्लास, कंप्यूटर लैब और अन्य आधुनिक सुविधाएं जरूरी हैं, लेकिन केवल तकनीकी सुविधाओं से शिक्षा व्यवस्था मजबूत नहीं होगी।

इसके लिए पर्याप्त संख्या में प्रशिक्षित शिक्षक, बेहतर भवन, प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय, खेल सुविधाएं, सुरक्षित परिवहन और नियमित निगरानी भी जरूरी है। खासतौर पर पहाड़ी क्षेत्रों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्लस्टर सिस्टम लागू होने के बाद दूर-दराज के बच्चों की शिक्षा तक पहुंच आसान होती है या मुश्किल। खेल प्रतिभाओं को लेकर भी उठे सवाल सरकारी व्यवस्था में खेल प्रतिभाओं को प्रोत्साहन देने को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। एक ताइक्वांडो खिलाड़ी बच्ची के मामले में अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए कथित तौर पर डेढ़ लाख रुपये की मांग किए जाने का आरोप सामने आया है। हालांकि, इस आरोप की स्वतंत्र और आधिकारिक पुष्टि आवश्यक है। यदि आरोप सही पाया जाता है तो यह राज्य में खेल प्रतिभाओं को आर्थिक सहयोग उपलब्ध कराने की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़ा करेगा।

शिक्षा के दावों और जमीनी हकीकत के बीच दूरी?

उत्तराखंड सरकार का कहना है कि क्लस्टर व्यवस्था के माध्यम से सरकारी विद्यालयों को बेहतर संसाधन उपलब्ध कराकर उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के केंद्र के रूप में विकसित किया जाएगा। वहीं आलोचकों का तर्क है कि सरकारी घोषणाओं और जमीनी स्थिति के बीच अंतर को दूर करना जरूरी है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्लस्टर सिस्टम लागू होने के बाद क्या विद्यार्थियों को वास्तव में बेहतर शिक्षक, आधुनिक सुविधाएं, सुरक्षित परिवहन और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल पाएगी? सरकारी स्कूलों का भविष्य केवल इस बात से तय नहीं होगा कि कितने विद्यालयों को क्लस्टर में शामिल किया गया, बल्कि इस बात से तय होगा कि हर बच्चे तक गुणवत्तापूर्ण और सुलभ शिक्षा कितनी प्रभावी ढंग से पहुंचती है।

रिपोर्टर : प्रवचन सिंह
 

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