मनुष्य का स्वभाव ही ऐसा है कि वह हमेशा कुछ-न-कुछ चाहता रहता है

दिल्ली : मनुष्य का स्वभाव ही ऐसा है कि वह हमेशा कुछ-न-कुछ चाहता रहता है। इच्छाएं समाप्त नहीं होतीं, बल्कि एक पूरी होने पर दूसरी जन्म ले लेती है। जब ये अपेक्षाएं पूरी नहीं होतीं, तो मन में बेचैनी और असंतोष उत्पन्न होता है। यही बेचैनी मनुष्य को स्थायी सुख की खोज में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है।

इसी आंतरिक खालीपन को भरने के लिए मनुष्य ईश्वर की ओर मुड़ता है। वह प्रार्थना करता है, समर्पण करता है और उस परम सत्ता से जुड़ने का प्रयास करता है, जिसे वह 'शिव' या 'परम पुरुष' के नाम से पुकारता है। यहां 'शिव' का अर्थ किसी विशेष रूप तक सीमित नहीं है, बल्कि उस सर्वोच्च चेतना से है, जो सब कुछ जानती, देखती और समझती है। इस सृष्टि में कोई भी विचार या कर्म ऐसा नहीं है, जो उससे छिपा रह सके। यह परम सत्ता केवल मौन दर्शक नहीं है, बल्कि समस्त सृष्टि के कल्याण का आधार भी है।

मनुष्य के अस्तित्व, उसकी चेतना और उसकी हर सांस उसी अदृश्य शक्ति के सहारे चलती है। मनुष्य जो कुछ भी चाहता है- सुख, सफलता, प्रेम या शांति- वह सब उसी परम सत्ता की अभिव्यक्ति है। फिर भी विडंबना यह है कि मनुष्य उसे पूरी तरह समझ नहीं पाता। जब कोई साधक अपने अहंकार को छोड़कर उस सत्ता के सामने पूर्ण समर्पण कर देता है, तब उसे ऐसा आनंद प्राप्त होता है, जिसे शब्दों में व्यक्त करना संभव नहीं होता। यह आनंद सामान्य सुख से परे होता है। यह आत्मा का संतोष है।

जब तक मनुष्य का मन बाहरी वस्तुओं में उलझा रहता है, तब तक वह एक अनजानी भूख से ग्रस्त रहता है। यह भूख केवल भोजन या भौतिक वस्तुओं की नहीं, बल्कि आंतरिक संतोष की होती है। मनुष्य बार-बार कहता है- "मुझे और चाहिए", लेकिन उसे यह समझ नहीं आता कि वह 'और' वास्तव में क्या है। यही तृष्णा उसे जीवन भर भटकाती रहती है। इस भूख का समाधान केवल उसी परम शांत सत्ता में है, जो समस्त सृष्टि का आधार है। वही एक ऐसा केंद्र है, जहां चेतन और जड़, सकारात्मक और नकारात्मक- सब कुछ एक साथ समाहित हो जाता है। जब मनुष्य उस केंद्र में जुड़ता है, तो उसकी सारी बेचैनियां शांत हो जाती हैं। यही अवस्था सच्चे आनंद और शांति की है।

इस मार्ग को समझाने के लिए आध्यात्मिक साधना को चार चरणों में विभाजित किया गया है। पहला चरण है- यातनाम, जहां मन स्थूल और सूक्ष्म के बीच भटकता रहता है। दूसरा है- व्याप्ति, जहां साधक लौ-हानि के बंधनों से ऊपर उठकर मानसिक शांति की ओर बढ़ता है। तीसरा चरण एकेंद्र, जहां आनंद का अनुभव मधुर और शांत प्रकाश की तरह होता है। अंतिम चरण है- यशीकरण, जहां मनुष्य अपनी सभी इच्छाओं पर नियंत्रण प्राप्त कर आत्म-साक्षात्कार की ओर अग्रसर होता है। यही वह अवस्था है, जहां पहुंचकर मनुष्य को यह अनुभव होता है कि अब उसे कुछ और पाने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उसने उस परम सत्य को पा लिया है, जो सभी इच्छाओं का अंत है।

अंततः, जीवन की सबसे बड़ी प्राप्ति कोई बाहरी वस्तु नहीं, बल्कि वह आंतरिक जुड़ाव है, जो हमें उस परम सत्ता से जोड़ता है। जब यह संबंध स्थापित हो जाता है, तो मनुष्य को वह शांति और आनंद मिलता है, जिसकी उसे हमेशा तलाश रहती है। तब सच में कुछ और पाने की आवश्यकता नहीं रह जाती।

रिपोर्टर : लखन यादव 

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